क्या धर्म के नाम पर जानवरों की कुर्बानी या बलि देना उचित है?...


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Umesh Upaadyay

Life Coach | Motivational Speaker

2:00

चेतावनी: इस टेक्स्ट में गलतियाँ हो सकती हैं। सॉफ्टवेर के द्वारा ऑडियो को टेक्स्ट में बदला गया है। ऑडियो सुन्ना चाहिये।

लेकिन हम इस ह्यूमन बिंग्स और हमारे जो सोसायटी है जो समाज है जहां पर हम खड़े हैं रातो रात ऐसा नहीं बन गया यह धीरे-धीरे बोल होते होते होते होते यहां तक पहुंचा है जिसमें हम लोगों की सोच का हम लोगों के वातावरण का हमारे काम हमारे एक्शन का बहुत प्रभाव पड़ता है तो हम इस पृथ्वी पर क्या करते हैं और पृथ्वी से हमें क्या मिलता है यह आदान-प्रदान चलता रहता है इसी तरीके से एक समाज का एक सोसायटी का एक सिस्टम का एक कल्चर का निर्माण होता है जब हम बोलते हैं कि धर्म के नाम पर जानवरों की कुर्बानी देकर हमें तो यह पता भी नहीं होगा बहुत सारे लोगों को पता भी नहीं होगा बल्कि अधिकांश लोगों को यह पता भी नहीं होती अगर शुरू में ऐसा कुछ कुर्बानी की प्रथा चली थी तो उसके पीछे लॉजिक क्या था रीजन क्या था आज वह कंप्लीट भी ट्रांसफर हो जाते हैं और हम क्या देखते हैं हम खा लिए देखने कि हमें कुर्बानी करनी है लेकिन हमें यह पता नहीं है कि क्या कोई लॉजिक था कई बार ऐसा भी होता है कि वह उस टाइम के लिए सही था लेकिन आज की तारीख में उस लॉजिक को उस चीज को वैसा करने की जरूरत नहीं है तो फिर उसकी जरूरत नहीं है आज हमें करने के लिए तो हमें वह नहीं करना चाहिए लेकिन अगर हमें पता लगता है हमें सबसे पहले पता चला कि ऐसा क्यों होता है बोतल से लॉजिक पर आई है आज की तारीख में भी वह करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए क्या जानवरों का वध करना चाहिए मेरे हिसाब से तो जरूरी एकदम जरूरी नहीं है ऐसा कोई भी भगवान कोई भी धर्म कोई भी जाती कोई भी ऐसा रिलेशन यह नहीं बताते कि आप एक दूसरे जीव की हत्या करें यह कहां लिखा होगा ध्यान से सोचिए किसी दूसरे जीव की हत्या करने को कौन हो सकता है किसी भी जाति का हो तो कॉमन सेंस भी लगाए तो यह सही नहीं है बाकी जैसा आपको ठीक लगे आप ऐसा कीजिए क्योंकि आप और हम जो भी करते हैं उसका कुछ कौन सीक्वेंस होता है तो कौन सीक्वेंस के लिए हमें तैयार रहना चाहिए डे इज लाइफ

lekin hum is human bings aur hamare jo sociaty hai jo samaaj hai jahan par hum khade hain raato raat aisa nahi ban gaya yah dhire dhire bol hote hote hote hote yahan tak pahuncha hai jisme hum logon ki soch ka hum logon ke vatavaran ka hamare kaam hamare action ka bahut prabhav padta hai toh hum is prithvi par kya karte hain aur prithvi se hamein kya milta hai yah aadaan pradan chalta rehta hai isi tarike se ek samaaj ka ek sociaty ka ek system ka ek culture ka nirmaan hota hai jab hum bolte hain ki dharam ke naam par jaanvaro ki kurbani dekar hamein toh yah pata bhi nahi hoga bahut saare logon ko pata bhi nahi hoga balki adhikaansh logon ko yah pata bhi nahi hoti agar shuru mein aisa kuch kurbani ki pratha chali thi toh uske peeche logic kya tha reason kya tha aaj vaah complete bhi transfer ho jaate hain aur hum kya dekhte hain hum kha liye dekhne ki hamein kurbani karni hai lekin hamein yah pata nahi hai ki kya koi logic tha kai baar aisa bhi hota hai ki vaah us time ke liye sahi tha lekin aaj ki tarikh mein us logic ko us cheez ko waisa karne ki zaroorat nahi hai toh phir uski zaroorat nahi hai aaj hamein karne ke liye toh hamein vaah nahi karna chahiye lekin agar hamein pata lagta hai hamein sabse pehle pata chala ki aisa kyon hota hai bottle se logic par I hai aaj ki tarikh mein bhi vaah karna chahiye ki nahi karna chahiye kya jaanvaro ka vadh karna chahiye mere hisab se toh zaroori ekdam zaroori nahi hai aisa koi bhi bhagwan koi bhi dharam koi bhi jaati koi bhi aisa relation yah nahi batatey ki aap ek dusre jeev ki hatya karen yah kahaan likha hoga dhyan se sochiye kisi dusre jeev ki hatya karne ko kaun ho sakta hai kisi bhi jati ka ho toh common sense bhi lagaye toh yah sahi nahi hai baki jaisa aapko theek lage aap aisa kijiye kyonki aap aur hum jo bhi karte hain uska kuch kaun sequence hota hai toh kaun sequence ke liye hamein taiyar rehna chahiye day is life

लेकिन हम इस ह्यूमन बिंग्स और हमारे जो सोसायटी है जो समाज है जहां पर हम खड़े हैं रातो रात ऐ

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