दुर्खीम के विचार बताएं?...


user
10:00
Play

चेतावनी: इस टेक्स्ट में गलतियाँ हो सकती हैं। सॉफ्टवेर के द्वारा ऑडियो को टेक्स्ट में बदला गया है। ऑडियो सुन्ना चाहिये।

नमस्कार बोलो भाइयों आपका एक समाजशास्त्रीय प्रश्न है दुर्खीम के विचार बताइए दुर्खीम एक बहुत बड़े समाजशास्त्री थे और उनका जो भी चार्ज भूमि के विषय में नमी मतलब विसंगति के विषय में है यह विसंगति क्या होती है थोड़ा सा मैं आपको आधुनिक समाजशास्त्रीय सिद्धांत के क्षेत्र में विसंगति की अवधारणा बहुत ही महत्वपूर्ण जर्मन दार्शनिक ही देखने को मिलता है उन्होंने इस शब्द का प्रयोग किया था और दूर कितने वास्तव में सर्वप्रथम एंड ओगी यानी संगति की अवधारणा को विकसित किया उनका कथन है कि सामाजिक संरचना या समाज का व्यक्ति पर केवल स्वास्थ्य प्रभाव ही नहीं अपितु और स्वास्थ्य प्रभाव भी पड़ता है और और स्वस्थ प्रभाव पड़ने पर व्यक्ति के व्यवहार में विसंगति नियम हीनता देखने को मिलती है जिसकी चरम अभिव्यक्ति आत्महत्या है मुख्य रूप से आत्महत्या से संबंधित सिद्धांत किन परिस्थितियों में पढ़कर के आत्महत्या कर लेता है श्री गुरु दुर्खीम के अनुसार मनुष्य को अस्थान के मानसिक शारीरिक आर्थिक राजनैतिक सामाजिक सांस्कृतिक आदि आवश्यकताएं होती है और प्रत्येक व्यक्ति आवश्यकताओं की अधिकतम पूर्ति चाहता है और समाज व्यवस्था व संगठन को बनाए रखने के लिए उन्हें मनमाने ढंग से कार्य करने की अनुमति समाज नहीं देता अपितु उन पर सामूहिक नियमों का ज्ञान यदि क्वालिटी बॉर्डर के द्वारा नियंत्रण की व्यवस्था करता है पर कभी-कभी ऐसा भी होता है कि उन सामूहिक नियमों का प्रभाव घट जाता है और इस अवसर से फायदा उठाकर समाज के सदस्य मनमाने तौर पर अपने अपने स्वार्थों की अधिकतम पूर्ति में लग जाते हैं समाज में विवेक आदर्श एक और रखा रह जाता है और व्यक्ति विवेक ही तथा और स्वाभाविक अब नॉर्मल व्यवहार करने लगता है इस प्रकार का स्वाभाविक व्यवहार समाज में एक ही कोई क्रांतिकारी परिवर्तन हो जाने के फलस्वरूप भी हो सकता है क्योंकि इस प्रकार के एकाएक परिवर्तन के फलस्वरूप उत्पन्न परिस्थितियों के समाज के लोग अपना अनुकूलन करने में असफल रहते हैं तथा उनके व्यवहार में आदर्श सुंदरता और अस्वाभाविक तक जाती है यही विसंगति की है श्री दुर्खीम का विचार है कि एक बार जब समाज में विसंगति की स्थिति उत्पन्न हो जाती है तो फिर वह छूत की बीमारी की तरफ फैलती जाती है और संपूर्ण समाज में मूल्य भी नेता व आदर्श विनता की स्थिति तब तक बनी रहती है जब तक सामाजिक शक्तियां अपने को प्रतिष्ठित करके समाज में संगठन व एकीकरण की स्थिति को उत्पन्न करने में सफल ना हो वास्तव में विसंगति अंग्रेजी में इसको एलोमी बोलते हैं नवमी की स्थिति में प्रत्येक व्यक्ति अपने मनमाने ढंग से अपनी आस्थाओं अभिलाषा हूं वह आवश्यकताओं की अधिकतम पूर्ति करने में जुट जाता है और ऐसा करते हुए ना तो उसे समाज की परवाह होती है लल्लू लाल या लोक निंदा की और ना ही सामाजिक आदर्शों की अथवा मूल्यों की उसके लिए तो अपना स्वार्थ सबसे बढ़कर होता है और उन स्वार्थों की संतुष्टि में उसका अपना व्यक्तिगत मूल्य ही उसके लिए सर्वोपरि होता है वह किसी भी प्रकार के नियंत्रण व आदर्श को स्वीकार नहीं करता और अपनी आस्थाओं व आवश्यकता को इतना बड़ा लेता है कि मैं व्यक्तिगत दायरे से निकलकर समाज की अपनी आशाओं को आवश्यकता ओं को छिन्न-भिन्न करके समाज में विसंगति की स्थिति उत्पन्न कर देता है जब व्यक्ति सामूहिक स्वार्थी नियमों तथा शक्तियों को तुच्छ समझने लगता है तो व्यक्ति और व्यक्ति के बीच व्यक्ति और समाज के बीच तथा समूह और समूह के बीच का जो पवित्र आधार है वह समाप्त हो जाता है रह जाती है केवल नवीन नेताओं के लिए अंदर जाने सुखों के लिए कभी ना बुझने वाली एक प्यास और यह जो है कहां लेकर जाती है ऐसी भेजो है आत्महत्या की तरफ ले करके जाती है एक उदाहरण से और इसको अस्पष्ट रुप से समझा दो आदर्श प्रस्तुत करता है कि अपनी योग्यता और प्रयत्नों के द्वारा व्यक्ति के लिए किसी भी उच्चतम लक्ष्य की प्राप्ति संभव है वह लखपति बन सकता है राष्ट्रपति हो सकता है यह संसार की सबसे सुंदर युवती को अपनी पत्नी के रूप में पा सकता है परंतु इन स्थितियों को प्राप्त करने के उचित और स्वीकृत साधन या प्रणालियां उसे अपने समाज में देखने को नहीं मिलती है उसके विपरीत वह या देता है कि समाज के अयोग्य सदस्य सिफारिश या पार्टी केवल पार्टी के बल पर सर्वोच्च पदों पर आसीन है तथा वास्तविक योग्य व्यक्तियों के लिए खाने तक का ठिकाना नहीं है और कष्टों से तंग आकर अंत में उन्हें आत्महत्या करनी पड़ती है वह व्यक्ति भी समाज की आशाओं पर धूल झुकता है समाज के आदर्श नियमों का उल्लंघन करता है और वह समझता है कि यही मेरे लिए आदर्श है चोरी करता है डाका डालता है जान शादी या गवन करता है यही उसके आचरण की विसंगतियां नियम हिलता है और परंतु इसका कारण सामाजिक संरचना में ही होता है कभी-कभी ऐसे मूल्य का समावेश होता है जो कि समाज के सदस्यों के इस समूह इस प्रकार के आदर्श को प्रस्तुत करते हैं कि उच्चतर पौधों को प्राप्त करने के लिए गतिशील या प्रयत्नशील बने रहना चाहिए उच्च पदों को प्राप्त करने में इतना तन में हो जाते हैं कि प्राथमिक सामूहिक संबंधों से बहुत दूर हो जाते हैं और उन्हें नष्ट कर देते हैं इस प्रकार जो है जैसे देखी एक उदाहरण है कि नौकरी करने वाली और विवाहित स्त्रियां अक्सर व्यंगात्मक कठिनाइयों में फंस जाती है जिनके कारण यह है कि नौकरी के क्षेत्र में अपने को प्रतिष्ठित करने में भी अपनी सुध बुध इतनी खो बैठती हैं कि परिवारिक संबंध या विवाह भी उनके लिए आवश्यक है यह बात उस समय भी स्वीकार नहीं करती है इसी प्रकार अपनी योग्यता और अपनी मेहनत से बने हुए व्यक्ति व्यापार में सफल हो सकते हैं परंतु दूसरे कार्यों में जैसे वह पिता और पति नहीं बन पाते हैं वे उस में असफल हो जाते हैं तो जो भूल व्यापार के क्षेत्र में उन्हें सफल प्रतिद्वंदी बनाते हैं आवश्यक रूप से उन्हें अच्छे पति और पिता नहीं बनाते हैं इस प्रकार के व्यक्तियों में परिवार के प्रति जो है मतलब वह योग्यताएं होती ही नहीं है उनमें जो है मद्यपान और विवाह विच्छेद की घटनाएं बहुत ज्यादा होती हैं और बेमेल विवाह भी उसमें होता है यह लिखा की पूर्ति करने के लिए यह सारी बातें जो हैं अंत में व्यक्ति को के लिए बहुत ही आत्मघाती होता है और व्यक्ति जो है वह कर के जो है आत्महत्या की तरफ चला जाता है दुर्खीम का सिद्धार्थ बहुत लंबा चौड़ा दिया है टेंशन हो रही है मरने की बात कर रहा है कहीं आत्महत्या तो नहीं कर लेगा और इंसानों को तलाक की जीत क्यों ऐसा बोल रहा है तो यह जो है उस किताब से मैंने इसको उद्धृत किया है और यह बहुत ही आज देखने को मिल रहा है इसीलिए सभी प्रकार के ज्ञान को रखना चाहिए जीवन में आप कितना भी ऊंचाई पर चले जाइए आप आपको परिवार बसा ही लेना चाहिए आप ज्यादा दूर भागेंगे तो जीवन में कुछ भी हासिल नहीं करेंगे आपको लगेगा कि सारे मर्द जो है छुपा सकते हैं और किसी एक के प्रति समर्पित हो जाइए देखिएगा छोटे-छोटे बच्चे आएंगे और उसके बाद जो है आपका जीवन इतना सुख में और इतना बढ़िया हो जाएगा जिसका कोई वर्णन नहीं अन्यथा यह धन दौलत समस्या जो है खत्म हो जाएगा आप लोग उसका कोई माने नहीं रहेगा वाला ही नहीं रहेगा तो सामान अच्छा

namaskar bolo bhaiyo aapka ek samajashastreey prashna hai durkhim ke vichar bataiye durkhim ek bahut bade samajshastri the aur unka jo bhi charge bhoomi ke vishay me nami matlab visangati ke vishay me hai yah visangati kya hoti hai thoda sa main aapko aadhunik samajashastreey siddhant ke kshetra me visangati ki avdharna bahut hi mahatvapurna german darshnik hi dekhne ko milta hai unhone is shabd ka prayog kiya tha aur dur kitne vaastav me sarvapratham and ogi yani sangati ki avdharna ko viksit kiya unka kathan hai ki samajik sanrachna ya samaj ka vyakti par keval swasthya prabhav hi nahi apitu aur swasthya prabhav bhi padta hai aur aur swasth prabhav padane par vyakti ke vyavhar me visangati niyam hinata dekhne ko milti hai jiski charam abhivyakti atmahatya hai mukhya roop se atmahatya se sambandhit siddhant kin paristhitiyon me padhakar ke atmahatya kar leta hai shri guru durkhim ke anusaar manushya ko asthan ke mansik sharirik aarthik rajnaitik samajik sanskritik aadi aavashyakataen hoti hai aur pratyek vyakti avashayaktaon ki adhiktam purti chahta hai aur samaj vyavastha va sangathan ko banaye rakhne ke liye unhe manmane dhang se karya karne ki anumati samaj nahi deta apitu un par samuhik niyamon ka gyaan yadi quality border ke dwara niyantran ki vyavastha karta hai par kabhi kabhi aisa bhi hota hai ki un samuhik niyamon ka prabhav ghat jata hai aur is avsar se fayda uthaakar samaj ke sadasya manmane taur par apne apne swarthon ki adhiktam purti me lag jaate hain samaj me vivek adarsh ek aur rakha reh jata hai aur vyakti vivek hi tatha aur swabhavik ab normal vyavhar karne lagta hai is prakar ka swabhavik vyavhar samaj me ek hi koi krantikari parivartan ho jaane ke phalswarup bhi ho sakta hai kyonki is prakar ke ekaek parivartan ke phalswarup utpann paristhitiyon ke samaj ke log apna anukulan karne me asafal rehte hain tatha unke vyavhar me adarsh sundarta aur aswabhavik tak jaati hai yahi visangati ki hai shri durkhim ka vichar hai ki ek baar jab samaj me visangati ki sthiti utpann ho jaati hai toh phir vaah chut ki bimari ki taraf failati jaati hai aur sampurna samaj me mulya bhi neta va adarsh vinta ki sthiti tab tak bani rehti hai jab tak samajik shaktiyan apne ko pratishthit karke samaj me sangathan va ekikaran ki sthiti ko utpann karne me safal na ho vaastav me visangati angrezi me isko elomi bolte hain navami ki sthiti me pratyek vyakti apne manmane dhang se apni asthaon abhilasha hoon vaah avashayaktaon ki adhiktam purti karne me jut jata hai aur aisa karte hue na toh use samaj ki parvaah hoti hai Lallu laal ya lok ninda ki aur na hi samajik aadarshon ki athva mulyon ki uske liye toh apna swarth sabse badhkar hota hai aur un swarthon ki santushti me uska apna vyaktigat mulya hi uske liye sarvopari hota hai vaah kisi bhi prakar ke niyantran va adarsh ko sweekar nahi karta aur apni asthaon va avashyakta ko itna bada leta hai ki main vyaktigat daayre se nikalkar samaj ki apni ashaon ko avashyakta on ko chinn bhinn karke samaj me visangati ki sthiti utpann kar deta hai jab vyakti samuhik swaarthi niyamon tatha shaktiyon ko tucch samjhne lagta hai toh vyakti aur vyakti ke beech vyakti aur samaj ke beech tatha samuh aur samuh ke beech ka jo pavitra aadhar hai vaah samapt ho jata hai reh jaati hai keval naveen netaon ke liye andar jaane sukho ke liye kabhi na bujhane wali ek pyaas aur yah jo hai kaha lekar jaati hai aisi bhejo hai atmahatya ki taraf le karke jaati hai ek udaharan se aur isko aspast roop se samjha do adarsh prastut karta hai ki apni yogyata aur prayatnon ke dwara vyakti ke liye kisi bhi ucchatam lakshya ki prapti sambhav hai vaah lakhapati ban sakta hai rashtrapati ho sakta hai yah sansar ki sabse sundar yuvati ko apni patni ke roop me paa sakta hai parantu in sthitiyo ko prapt karne ke uchit aur sawikrit sadhan ya pranaliyan use apne samaj me dekhne ko nahi milti hai uske viprit vaah ya deta hai ki samaj ke ayogya sadasya sifarish ya party keval party ke bal par sarvoch padon par aaseen hai tatha vastavik yogya vyaktiyon ke liye khane tak ka thikana nahi hai aur kaston se tang aakar ant me unhe atmahatya karni padti hai vaah vyakti bhi samaj ki ashaon par dhul jhukta hai samaj ke adarsh niyamon ka ullanghan karta hai aur vaah samajhata hai ki yahi mere liye adarsh hai chori karta hai daka dalta hai jaan shaadi ya gavan karta hai yahi uske aacharan ki visangatiyan niyam hilata hai aur parantu iska karan samajik sanrachna me hi hota hai kabhi kabhi aise mulya ka samavesh hota hai jo ki samaj ke sadasyon ke is samuh is prakar ke adarsh ko prastut karte hain ki uchatar paudho ko prapt karne ke liye gatisheel ya prayatnashil bane rehna chahiye ucch padon ko prapt karne me itna tan me ho jaate hain ki prathmik samuhik sambandhon se bahut dur ho jaate hain aur unhe nasht kar dete hain is prakar jo hai jaise dekhi ek udaharan hai ki naukri karne wali aur vivaahit striyan aksar vyangatmak kathinaiyon me fans jaati hai jinke karan yah hai ki naukri ke kshetra me apne ko pratishthit karne me bhi apni sudh buddha itni kho baithati hain ki pariwarik sambandh ya vivah bhi unke liye aavashyak hai yah baat us samay bhi sweekar nahi karti hai isi prakar apni yogyata aur apni mehnat se bane hue vyakti vyapar me safal ho sakte hain parantu dusre karyo me jaise vaah pita aur pati nahi ban paate hain ve us me asafal ho jaate hain toh jo bhool vyapar ke kshetra me unhe safal pratidwandi banate hain aavashyak roop se unhe acche pati aur pita nahi banate hain is prakar ke vyaktiyon me parivar ke prati jo hai matlab vaah yogyataen hoti hi nahi hai unmen jo hai madyapan aur vivah vichched ki ghatnaye bahut zyada hoti hain aur bemel vivah bhi usme hota hai yah likha ki purti karne ke liye yah saari batein jo hain ant me vyakti ko ke liye bahut hi aatmghaati hota hai aur vyakti jo hai vaah kar ke jo hai atmahatya ki taraf chala jata hai durkhim ka siddharth bahut lamba chauda diya hai tension ho rahi hai marne ki baat kar raha hai kahin atmahatya toh nahi kar lega aur insano ko talak ki jeet kyon aisa bol raha hai toh yah jo hai us kitab se maine isko uddhrit kiya hai aur yah bahut hi aaj dekhne ko mil raha hai isliye sabhi prakar ke gyaan ko rakhna chahiye jeevan me aap kitna bhi unchai par chale jaiye aap aapko parivar basa hi lena chahiye aap zyada dur bhagenge toh jeevan me kuch bhi hasil nahi karenge aapko lagega ki saare mard jo hai chupa sakte hain aur kisi ek ke prati samarpit ho jaiye dekhiega chote chote bacche aayenge aur uske baad jo hai aapka jeevan itna sukh me aur itna badhiya ho jaega jiska koi varnan nahi anyatha yah dhan daulat samasya jo hai khatam ho jaega aap log uska koi maane nahi rahega vala hi nahi rahega toh saamaan accha

नमस्कार बोलो भाइयों आपका एक समाजशास्त्रीय प्रश्न है दुर्खीम के विचार बताइए दुर्खीम एक बहुत

Romanized Version
Likes  33  Dislikes    views  420
KooApp_icon
WhatsApp_icon
1 जवाब
no img
qIcon
ask
ऐसे और सवाल
Loading...
Loading...
qIcon
ask

This Question Also Answers:

QuestionsProfiles

Vokal App bridges the knowledge gap in India in Indian languages by getting the best minds to answer questions of the common man. The Vokal App is available in 11 Indian languages. Users ask questions on 100s of topics related to love, life, career, politics, religion, sports, personal care etc. We have 1000s of experts from different walks of life answering questions on the Vokal App. People can also ask questions directly to experts apart from posting a question to the entire answering community. If you are an expert or are great at something, we invite you to join this knowledge sharing revolution and help India grow. Download the Vokal App!