दूसरों के पारस्परिक मेल से उत्पन्न विकार को क्या कहते हैं?...


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नमस्कार रिकी आपका प्रश्न है दूसरों के पारस्परिक मेल से उत्पन्न विकार को क्या कहते हैं देखी इसको यूं समझिए कि जैसे शत्रु का शत्रु मित्र होता अपने सफल शत्रु है उसका जो शत्रु होगा वह हमारा मित्र होता है उसी प्रकार जब अपना कोई शत्रु होता है उसका किसी दूसरे के साथ में मेल होता है और तब उसका कोई मित्र होता है वह अपना सब उसी प्रकार अपने किसी शत्रु का कोई मित्र है क्योंकि उसका मित्र है वह अपना शत्रु है जो उसका मित्र होगा वह भी अपना ही खत्म होगा इसको मनोवैज्ञानिक भाषा में ईर्ष्या विकार कहा गया है इससे हमारे मन में ईर्ष्या होती है उस कंट्रा उसकी है जलन होती है उस शिकार को ईर्ष्या विकास कहते हैं धन्यवाद

namaskar riki aapka prashna hai dusro ke paarasparik male se utpann vikar ko kya kehte hain dekhi isko yun samjhiye ki jaise shatru ka shatru mitra hota apne safal shatru hai uska jo shatru hoga vaah hamara mitra hota hai usi prakar jab apna koi shatru hota hai uska kisi dusre ke saath me male hota hai aur tab uska koi mitra hota hai vaah apna sab usi prakar apne kisi shatru ka koi mitra hai kyonki uska mitra hai vaah apna shatru hai jo uska mitra hoga vaah bhi apna hi khatam hoga isko manovaigyanik bhasha me irshya vikar kaha gaya hai isse hamare man me irshya hoti hai us kantra uski hai jalan hoti hai us shikaar ko irshya vikas kehte hain dhanyavad

नमस्कार रिकी आपका प्रश्न है दूसरों के पारस्परिक मेल से उत्पन्न विकार को क्या कहते हैं देख

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virendra agrawal

AAPKA MITRA

1:12
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चेतावनी: इस टेक्स्ट में गलतियाँ हो सकती हैं। सॉफ्टवेर के द्वारा ऑडियो को टेक्स्ट में बदला गया है। ऑडियो सुन्ना चाहिये।

दूसरों के पारस्परिक विकार को क्या कहते हैं जब भी हम दूसरों से मिलते हैं फूफा जी के लोगों से मिलने से अच्छे लोगों से मिलने से हमारे मन में अच्छे विचार जागृत होते हैं और बुरे लोगों से मिलने में हमारे अंदर बुराइयों का अंकुरण होता है तो हमारे द्वारा जिन से भी संबंध रखे जाते हैं उन व्यक्तियों का व्यक्तित्व का प्रभाव हम पर निश्चय ही होता है अच्छे लोगों की संगत से हम अच्छे बनते हैं और बुरे लोगों की संगत से बुरे बनते हैं इसीलिए समाज में बुरे लोगों की संगति से दूर रहने को कहा जाता है ताकि उनकी संगत में हम बुराइयों की ओर आगे अग्रसर ना हो धन्यवाद

dusro ke paarasparik vikar ko kya kehte hain jab bhi hum dusro se milte hain fufa ji ke logo se milne se acche logo se milne se hamare man me acche vichar jagrit hote hain aur bure logo se milne me hamare andar buraiyon ka ankuran hota hai toh hamare dwara jin se bhi sambandh rakhe jaate hain un vyaktiyon ka vyaktitva ka prabhav hum par nishchay hi hota hai acche logo ki sangat se hum acche bante hain aur bure logo ki sangat se bure bante hain isliye samaj me bure logo ki sangati se dur rehne ko kaha jata hai taki unki sangat me hum buraiyon ki aur aage agrasar na ho dhanyavad

दूसरों के पारस्परिक विकार को क्या कहते हैं जब भी हम दूसरों से मिलते हैं फूफा जी के लोगों

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