14 वा अध्याय का गीता में भगवान से किन 26 श्लोक में बोले हैं कि जो पुरुष और व्यभिचारी भक्ति योग द्वारा मुझको निरंतर भरता है वह भी इन तीनों गुणों के भली-भांति लांग कर सच्चिदानंद घन ब्रह्म को प्राप्त होने के लिए योग बन जाता है इसका इनके कहने का तात्पर्य क्या है?...


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सच्चितानंद धन प्राप्ति के लिए भगवान श्री कृष्णा हमेशा कहते हैं के अंजाना चल अक्षरा ने आत्महत्या की पहाड़ी अपना सपना की सपना नाचे घर की आस्था 5639 देखो का छोटा भाई रहता तो हम भुला से लागत समझाना या तो हम शब्दाची इस बात को जातक करते हुए अगर योग प्रसाद सदा रे भगवान श्री कृष्ण ने बताए मूल मंत्र के तहत हम जिंदगी में अगर उसका इस्तेमाल करते हैं तो वह विचारी व्यक्ति भी निरंतर भली-भांति ज्ञान को प्राप्त कर सकता है और सच्चिदानंद घन को प्राप्त कर सकता है इसीलिए हमें हमारे जो धार्मिक ग्रंथ है धर्म ग्रंथ है भगवत गीता उसी के अनुसार दिनचर्या और जीवन चर्या बिताना चाहिए तो हमें ज्ञान की प्राप्ति अवश्य हो जाएगी

sachchitanand dhan prapti ke liye bhagwan shri krishna hamesha kehte hain ke anjaana chal akshara ne atmahatya ki pahadi apna sapna ki sapna nache ghar ki astha 5639 dekho ka chota bhai rehta toh hum bhula se laagat samajhana ya toh hum shabdachi is baat ko jatak karte hue agar yog prasad sada ray bhagwan shri krishna ne bataye mul mantra ke tahat hum zindagi me agar uska istemal karte hain toh vaah vichari vyakti bhi nirantar bhali bhanti gyaan ko prapt kar sakta hai aur sacchidanand ghan ko prapt kar sakta hai isliye hamein hamare jo dharmik granth hai dharm granth hai bhagwat geeta usi ke anusaar dincharya aur jeevan charya bitana chahiye toh hamein gyaan ki prapti avashya ho jayegi

सच्चितानंद धन प्राप्ति के लिए भगवान श्री कृष्णा हमेशा कहते हैं के अंजाना चल अक्षरा ने आ

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Rajkumar Koree

Founder & Director - Fitstop Fitness Studio

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इसका कहने का मतलब यह है जब आप किसी भी चीज को निरंतर और लंबे समय तक करते हैं तो आप उसमें कहीं ना कहीं परमात्मा सच्चिदानंद भगवान को देखते हैं और धीरे-धीरे वह आपका योग एक भक्ति में बदल जाता है अब किसी भी चीज को करके देखी उसमें एक ना एक दिन आप की आवश्यक एक भक्ति में बदल जाएगी

iska kehne ka matlab yah hai jab aap kisi bhi cheez ko nirantar aur lambe samay tak karte hain toh aap usme kahin na kahin paramatma sacchidanand bhagwan ko dekhte hain aur dhire dhire vaah aapka yog ek bhakti me badal jata hai ab kisi bhi cheez ko karke dekhi usme ek na ek din aap ki aavashyak ek bhakti me badal jayegi

इसका कहने का मतलब यह है जब आप किसी भी चीज को निरंतर और लंबे समय तक करते हैं तो आप उसमें कह

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योगाचार्य S.S.Rawat🕉🔱🚩🙏

Lecturer Of Yog And Alternative Therapy

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भगवान श्री कृष्ण ने 14 अध्याय में यही समझाने का प्रयास किया है कि मेरे सिवा इस संसार में जो भी चीजें और नश्वर है जितने भी व्यक्ति हैं वह मेरे से ही उत्पन्न हुए हैं और अंत में मुझ में ही विलीन हो जाते हैं

bhagwan shri krishna ne 14 adhyay me yahi samjhane ka prayas kiya hai ki mere siva is sansar me jo bhi cheezen aur nashwar hai jitne bhi vyakti hain vaah mere se hi utpann hue hain aur ant me mujhse me hi vileen ho jaate hain

भगवान श्री कृष्ण ने 14 अध्याय में यही समझाने का प्रयास किया है कि मेरे सिवा इस संसार में ज

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नमस्कार जी आपका जो प्रश्न है 14 अध्याय 28 के श्लोक के बारे में ब्रिटिश को ध्यान से पढ़िए लोग बेचारे भक्ति दोगे न के बेटे तब उड़ान समिति तथा ब्रह्मभोज आयतें इसमें लिखा है और जो पुरुष अब व्यभिचारी भक्ति योग के द्वारा मुझको निरंतर भागता है वह भी इन तीनों गुणों को भलीभांति लाकर सच्चिदानंद ब्रह्मा को प्राप्त होने के लिए योग्य बन जाता है व्यभिचारी शब्द नहीं है अब व्यभिचारी शब्द है अबे बिचारी का तात्पर्य है केवल एक परमेश्वर को अपने स्वामी मारता हुआ स्वार्थ और अभिमान को क्या श्रद्धा और भाव के सहित परम प्रेम से निरंतर चिंतन करने को अब यदि चारी भक्ति योग कहते हैं तो अभिमान के बिना एक ईश्वर में लाए हो जाने को अभी-अभी चारी योग करते लेकिन व्यभिचारी और अविकारी शब्द में अंतर है अबे बिचारी का तात्पर्य है कि जो व्यभिचारी होता है वह हर जगह मुंह मारता है बिचारी का तात्पर्य चरित्रहीन से भी है कि जो एक जगह ठीक नहीं पाता है और अपने इंद्रियों के साथ कई जगह जो है भोग वासना में तल्लीन रहता है अभी भी अभी अभी अभी क्या कर आता है कि जो व्यक्ति इन सब से मुक्त होकर के श्री वासनाओं से मुक्त होकर के और इन सब के अभिमान से मुक्त होकर के और परम पिता परमेश्वर को एक मानकर उस में तल्लीन हो जाता है सब कुछ छोड़कर क्योंकि उसको अधिकारी चाहते हैं रवी चारी अबे बिचारी में और भी अंतर है जहां पर विचार होता है वहां शारीरिक रोग का पोषण होता है और जहां 84 होता है वहां शरीर की जगह परमात्मा जुड़ा होता है यदि चेहरे वाली के जुड़ाव जा अबे विचार है वहां परमात्मा आत्मीय चुनाव का जावेद विचार है वहां स्त्री और पुरुष का शरीर बढ़ता है वहां लिंगभेद आ जाता है जहां व्यभिचार है वहां भी जुड़ता लिंग भेद नहीं आता वहां पर आर्य प्राण जुड़ेंगे अथवा प्राण और परमात्मा जुड़ेंगे गीता के इस श्लोक का तात्पर्य प्राण और परमात्मा से खत्म हो गया किंतु जुड़ा उसी तरह से हैं जिस तरह से स्त्री और पुरुष का पेड़ होता है अपने में समाते रामस्वरूप के पुरुषत्व को त्याग कर अपने स्वरूप को इस रिपोर्ट में लाना और परम पुरुष ईश्वर को पुरुष मान करके उसको परम पुरुष मान करके उसके साथ आत्मीय परम आत्मीय सहयोग करना है क्यों क्योंकि वह एक ही स्थान पर है एक ही जगह पर है जगह जगह नहीं है कई जगह नहीं है हर जगह नहीं है अलग-अलग रूप में नहीं हूं जहां पर अलग-अलग रूप है वहां अलग-अलग रूप के प्रति आकर्षण है वहां व्यभिचार है जहां एक रूप के प्रति आकर्षण जाकर के टिक गया है वह जगह अबे अधिकार की श्रेणी में आते हैं धन्यवाद

namaskar ji aapka jo prashna hai 14 adhyay 28 ke shlok ke bare me british ko dhyan se padhiye log bechare bhakti doge na ke bete tab udaan samiti tatha brahmabhoj ayaten isme likha hai aur jo purush ab vyabhichari bhakti yog ke dwara mujhko nirantar bhagta hai vaah bhi in tatvo gunon ko bhalibhanti lakar sacchidanand brahma ko prapt hone ke liye yogya ban jata hai vyabhichari shabd nahi hai ab vyabhichari shabd hai abe bichari ka tatparya hai keval ek parmeshwar ko apne swami maarta hua swarth aur abhimaan ko kya shraddha aur bhav ke sahit param prem se nirantar chintan karne ko ab yadi chari bhakti yog kehte hain toh abhimaan ke bina ek ishwar me laye ho jaane ko abhi abhi chari yog karte lekin vyabhichari aur avikari shabd me antar hai abe bichari ka tatparya hai ki jo vyabhichari hota hai vaah har jagah mooh maarta hai bichari ka tatparya charitraheen se bhi hai ki jo ek jagah theek nahi pata hai aur apne indriyon ke saath kai jagah jo hai bhog vasana me tallinn rehta hai abhi bhi abhi abhi abhi kya kar aata hai ki jo vyakti in sab se mukt hokar ke shri vasnaon se mukt hokar ke aur in sab ke abhimaan se mukt hokar ke aur param pita parmeshwar ko ek maankar us me tallinn ho jata hai sab kuch chhodkar kyonki usko adhikari chahte hain Ravi chari abe bichari me aur bhi antar hai jaha par vichar hota hai wahan sharirik rog ka poshan hota hai aur jaha 84 hota hai wahan sharir ki jagah paramatma juda hota hai yadi chehre wali ke judav ja abe vichar hai wahan paramatma atmiya chunav ka javed vichar hai wahan stree aur purush ka sharir badhta hai wahan lingabhed aa jata hai jaha vyabhichaar hai wahan bhi judta ling bhed nahi aata wahan par arya praan judenge athva praan aur paramatma judenge geeta ke is shlok ka tatparya praan aur paramatma se khatam ho gaya kintu juda usi tarah se hain jis tarah se stree aur purush ka ped hota hai apne me samate ramsvarup ke purushatwa ko tyag kar apne swaroop ko is report me lana aur param purush ishwar ko purush maan karke usko param purush maan karke uske saath atmiya param atmiya sahyog karna hai kyon kyonki vaah ek hi sthan par hai ek hi jagah par hai jagah jagah nahi hai kai jagah nahi hai har jagah nahi hai alag alag roop me nahi hoon jaha par alag alag roop hai wahan alag alag roop ke prati aakarshan hai wahan vyabhichaar hai jaha ek roop ke prati aakarshan jaakar ke tick gaya hai vaah jagah abe adhikaar ki shreni me aate hain dhanyavad

नमस्कार जी आपका जो प्रश्न है 14 अध्याय 28 के श्लोक के बारे में ब्रिटिश को ध्यान से पढ़िए ल

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DEVINDER S CHEEMA

yoga Health Religious Teacher

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यह सत्य है कि प्रभु की भक्ति से पापी से पापी आदमी अभी अपना अंतर प्रभु की भक्ति करने से उसका 2018 में पुरुषों में बन जाता है जैसे बाल वीर बहुत बड़ा गलत मीटर गया था लेकिन जब उसको ज्ञान हुआ तो उसी बाल में कितने अरमान लिख दिए सब प्रभु जी प्रभु की भक्ति करने से जो किए हुए पाप है किशनगढ़ जाते हैं पापी मुख्य विधर्मी बन जाता है कि भगवान के भक्ति की विशेषता है

yah satya hai ki prabhu ki bhakti se papi se papi aadmi abhi apna antar prabhu ki bhakti karne se uska 2018 me purushon me ban jata hai jaise baal veer bahut bada galat meter gaya tha lekin jab usko gyaan hua toh usi baal me kitne armaan likh diye sab prabhu ji prabhu ki bhakti karne se jo kiye hue paap hai kishangarh jaate hain papi mukhya vidharmi ban jata hai ki bhagwan ke bhakti ki visheshata hai

यह सत्य है कि प्रभु की भक्ति से पापी से पापी आदमी अभी अपना अंतर प्रभु की भक्ति करने से उसक

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हां इस प्रश्न का जवाब है कि जब चाहे जैसा भी हो जारी व्यक्ति हो या चरित्रहीन व्यक्ति हो ओह सॉरी

haan is prashna ka jawab hai ki jab chahen jaisa bhi ho jaari vyakti ho ya charitraheen vyakti ho oh sorry

हां इस प्रश्न का जवाब है कि जब चाहे जैसा भी हो जारी व्यक्ति हो या चरित्रहीन व्यक्ति हो ओह

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Bharat

Engineering In Arch Wlding..

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भगवान कृष्ण का कहने का तात्पर्य है कि जय आदमी कैसा भी हो अगर वह मुझे परम तत्व को प्राप्त कर ले तो मैं उसके सारे पापों को क्षमा करें उसे अपना स्वरूप अपनी समूह बना देता है और वह छोटी बन जाती है उसमें एंटरप्र जाता है

bhagwan krishna ka kehne ka tatparya hai ki jai aadmi kaisa bhi ho agar vaah mujhe param tatva ko prapt kar le toh main uske saare paapon ko kshama kare use apna swaroop apni samuh bana deta hai aur vaah choti ban jaati hai usme entarpra jata hai

भगवान कृष्ण का कहने का तात्पर्य है कि जय आदमी कैसा भी हो अगर वह मुझे परम तत्व को प्राप्त क

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इसका कहने का अर्थ है कि अगर कोई भी पुरुष या कोई भी ऐसा पुरुष ने अपने पूर्व जीवन में यह जो उसका वर्तमान जीवन चल रहा है उसमें अनेकों प्राप्त किए हो अगर वह व्यक्ति भी भक्ति योग का मां अपनाता है और मुझ को निरंतर बजता है अर्थात मेरी नियंदर भक्ति करता है भक्ति योग का मार्ग अपनाकर तो वह भी जो 3 गुण होते हैं सत रज तम तीन गुणों का भलीभांति से लॉन्ग कर मैं ब्रह्म यथार्थ मुझ में लीन हो जाता है अर्थात वह परमात्मा तक मेरी प्राप्त कर लेता है और उधर मोक्ष की प्राप्ति कर देता है इसका सही अर्थ है

iska kehne ka arth hai ki agar koi bhi purush ya koi bhi aisa purush ne apne purv jeevan me yah jo uska vartaman jeevan chal raha hai usme anekon prapt kiye ho agar vaah vyakti bhi bhakti yog ka maa apnaata hai aur mujhse ko nirantar bajta hai arthat meri niyandar bhakti karta hai bhakti yog ka marg apnakar toh vaah bhi jo 3 gun hote hain sat raj tum teen gunon ka bhalibhanti se long kar main Brahma yatharth mujhse me Lean ho jata hai arthat vaah paramatma tak meri prapt kar leta hai aur udhar moksha ki prapti kar deta hai iska sahi arth hai

इसका कहने का अर्थ है कि अगर कोई भी पुरुष या कोई भी ऐसा पुरुष ने अपने पूर्व जीवन में यह जो

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भारता नहीं भाजपा कहने का तात्पर्य है कि हमारी भक्ति अधोगामी अर्थात नीचे की तरफ से आ रही है कि ऊपर की तरफ इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि आप सोच क्या रहे हैं आपकी सोच ही आपको ऊपर ले जाती है और नीचे गिर आती है भक्ति जो है ईश्वर का नाम जो है हमें और भगवानी अर्थात संसार इक्ता से खींचकर हमें ऊपर की तरफ ले जाती है जिससे बच्चे को हम लोग यह नहीं बता सकते कि तुम सॉकेट या स्विच को मछुआ तुमको करंट मार देगा हम उसको दूसरी भाषा में समझाने का प्रयास करते जिसे तो कोई इश्क में भूत है इसको छोड़ोगे तो यह हो जाएगा इस तरह से वैसे ही हर चीज को साइंस वीकली समझाना मुश्किल है लेकिन जब ईश्वर की भक्ति करते हैं तो उस समय हमारा मस्तिष्क हमारी बुद्धि सांसारिक ता के बारे में सोचना बंद करके उर्दू ग्राम मी पद पर बढ़ती है और धीरे-धीरे लंबे समय के बाद हमारे पाप नष्ट होते हैं और हम तीनों गुणों को भलीभांति लांग सकते हैं

bharta nahi bhajpa kehne ka tatparya hai ki hamari bhakti adhogami arthat niche ki taraf se aa rahi hai ki upar ki taraf iska sabse bada pramaan hai ki aap soch kya rahe hain aapki soch hi aapko upar le jaati hai aur niche gir aati hai bhakti jo hai ishwar ka naam jo hai hamein aur bhagvani arthat sansar ikta se khichkar hamein upar ki taraf le jaati hai jisse bacche ko hum log yah nahi bata sakte ki tum socket ya switch ko machuaa tumko current maar dega hum usko dusri bhasha me samjhane ka prayas karte jise toh koi ishq me bhoot hai isko chodoge toh yah ho jaega is tarah se waise hi har cheez ko science weekly samajhana mushkil hai lekin jab ishwar ki bhakti karte hain toh us samay hamara mastishk hamari buddhi sansarik ta ke bare me sochna band karke urdu gram me pad par badhti hai aur dhire dhire lambe samay ke baad hamare paap nasht hote hain aur hum tatvo gunon ko bhalibhanti lang sakte hain

भारता नहीं भाजपा कहने का तात्पर्य है कि हमारी भक्ति अधोगामी अर्थात नीचे की तरफ से आ रही ह

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Vinod Shukla

Yoga Instructor

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इस प्रश्न में भगवान का कहना है कि जो भी व्यक्ति चाहे वह पुरुषों के विचारी व्यक्ति भक्ति द्वारा अब मुझ को निरंतर बढ़ता जाता निरंतर ईश्वर का चिंतन करते हुए अपने शरीर के रोम रोम को ईश्वर के नाम से भर लेता है वह वह उस इन तीनों गुणों के काबिल बन जाता योग का वहां पर योग्य होना चाहिए अर्थात काबिल हो जाता है जो इस भक्ति योग द्वारा निरंतर ईश्वर का चिंतन करता है तो वह तीनों गुणों से भरपूर उस व्यक्ति को जो होता है वह काबिल बन जाता है योग्य बन जाता है

is prashna me bhagwan ka kehna hai ki jo bhi vyakti chahen vaah purushon ke vichari vyakti bhakti dwara ab mujhse ko nirantar badhta jata nirantar ishwar ka chintan karte hue apne sharir ke roam roam ko ishwar ke naam se bhar leta hai vaah vaah us in tatvo gunon ke kaabil ban jata yog ka wahan par yogya hona chahiye arthat kaabil ho jata hai jo is bhakti yog dwara nirantar ishwar ka chintan karta hai toh vaah tatvo gunon se bharpur us vyakti ko jo hota hai vaah kaabil ban jata hai yogya ban jata hai

इस प्रश्न में भगवान का कहना है कि जो भी व्यक्ति चाहे वह पुरुषों के विचारी व्यक्ति भक्ति द्

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Shashikant Mani Tripathi

Yoga Expert | Life Coach

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नाम तो यह विचारणा प्रतियोगी नशे व 13 * समिति प्रधान रिंकू या एकल पति अर्थात जो पुरुष और व्यभिचारी भक्ति योग से परमात्मा को निरंतर भरता है वह तीनों गुणों से भलीभांति मुक्त होकर परमात्मा को ही प्राप्त हो जाता है क्या प्राप्त होने योग्य हो जाता है इसका अर्थ यह है और आपने पूछा है कि इसको स्पष्ट किया जाए और व्यभिचारी भक्तियोग इसमें शब्द आया है ना कि व्यभिचारी जो आपने पूछा है और बेबी का मतलब हुआ कि उसके जीवन में परमात्मा के अतिरिक्त और किसी का ज्ञान ना हो यानी वो पूरे जगत को सियाराम में देखता हूं जिसको गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं सिया राम में सब जग जानी करहु प्रणाम जोर जुग पानी अर्थात जिसकी अबे बिचारी हो अर्थात उसमें कोई विचलन ना हो उसमें कोई बात ना हो कोई आशंका ना हो कोई संशय ना हो सुबह इन प्रकृति के तीन गुणों को भलीभांति लाकर अर्थात इन तीन गुणों से मुक्त होकर परमात्मा को प्राप्त हो जाता है परमात्मा को प्राप्त होने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि आप परमात्मा से अलग है या परमात्मा आपको प्राप्त नहीं है उसका वह आपको या किसी को इसलिए नहीं हो रहा है क्योंकि तीन गुणों से जो यह माया के द्वारा निर्मित उत्कृष्ट है इसी स्थिति में आपको अपने होने का पता चलता है बे अभाव का जन्म स्थान आत्मक प्रकृति के नाते होता है और व्यक्ति के अंदर जब तक हम मनोवृति अर्थात में और मीरा की धरती है देश को आदमी मैं मानता है अपना मानता है और देश से संबंधित विषयों को अपना मानता है इस व्यक्ति के साथ होने का मतलब हुआ कि प्रकृति के तीनों गुणों के साथ होना तो अगर वह में रहते हुए परमात्मा की वासुदेव कृष्ण की और व्यभिचारी भक्ति आपके जीवन में हो जाए तो आप इन तीनों गुणों में रहते हुए भी परमात्मा को प्राप्त करने की योग्यता अर्जित कर लेते हैं क्योंकि तीनों गुणों को लाने का मतलब हुआ परमात्मा की और व्यभिचारी भक्ति यानी उसके सिवाय दूसरे का ना होना सियाराम में हो जाना यहां वासुदेव में हो जाना यह जगतपुरा आपको ईश्वर मैं और जगत में ईश्वर और ईश्वर में जगत का दर्शन जब होता है तब आपको और व्यभिचारी बत्ती किस सिद्धि होती है और इसी सिद्धि के साथ मनुष्य तीनों गुणों को लाकर परमात्मा को प्राप्त हो जाता है धन्यवाद

naam toh yah vicharana pratiyogi nashe va 13 samiti pradhan rinku ya ekal pati arthat jo purush aur vyabhichari bhakti yog se paramatma ko nirantar bharta hai vaah tatvo gunon se bhalibhanti mukt hokar paramatma ko hi prapt ho jata hai kya prapt hone yogya ho jata hai iska arth yah hai aur aapne poocha hai ki isko spasht kiya jaaye aur vyabhichari bhaktiyog isme shabd aaya hai na ki vyabhichari jo aapne poocha hai aur baby ka matlab hua ki uske jeevan me paramatma ke atirikt aur kisi ka gyaan na ho yani vo poore jagat ko siyaram me dekhta hoon jisko goswami tulsidas ji kehte hain sia ram me sab jag jani karahu pranam jor jug paani arthat jiski abe bichari ho arthat usme koi vichalan na ho usme koi baat na ho koi ashanka na ho koi sanshay na ho subah in prakriti ke teen gunon ko bhalibhanti lakar arthat in teen gunon se mukt hokar paramatma ko prapt ho jata hai paramatma ko prapt hone ka arth yah kadapi nahi hai ki aap paramatma se alag hai ya paramatma aapko prapt nahi hai uska vaah aapko ya kisi ko isliye nahi ho raha hai kyonki teen gunon se jo yah maya ke dwara nirmit utkrasht hai isi sthiti me aapko apne hone ka pata chalta hai be abhaav ka janam sthan aatmkatha prakriti ke naate hota hai aur vyakti ke andar jab tak hum manovriti arthat me aur meera ki dharti hai desh ko aadmi main maanta hai apna maanta hai aur desh se sambandhit vishyon ko apna maanta hai is vyakti ke saath hone ka matlab hua ki prakriti ke tatvo gunon ke saath hona toh agar vaah me rehte hue paramatma ki vasudev krishna ki aur vyabhichari bhakti aapke jeevan me ho jaaye toh aap in tatvo gunon me rehte hue bhi paramatma ko prapt karne ki yogyata arjit kar lete hain kyonki tatvo gunon ko lane ka matlab hua paramatma ki aur vyabhichari bhakti yani uske shivaay dusre ka na hona siyaram me ho jana yahan vasudev me ho jana yah jagatapura aapko ishwar main aur jagat me ishwar aur ishwar me jagat ka darshan jab hota hai tab aapko aur vyabhichari batti kis siddhi hoti hai aur isi siddhi ke saath manushya tatvo gunon ko lakar paramatma ko prapt ho jata hai dhanyavad

नाम तो यह विचारणा प्रतियोगी नशे व 13 * समिति प्रधान रिंकू या एकल पति अर्थात जो पुरुष और व्

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