जब भी हमारे देश में शादी की बात होती है तो हमेशा धर्म को इतना ज़्यादा मान्यता क्यों दी जाती है?...


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DR SUNIL K. VAIDIK

Psychologist, Spritualist, Doctor, Philosopher

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नमस्ते मैं डॉक्टर सुनील के वैदिक आपके प्रश्नों के समाधान में पुनः प्रस्तुत हूं आप ने प्रश्न किया है जब भी हमारे देश में शादी के बाद होती है तो हमेशा धर्म को इतना ज्यादा मान्यता क्यों दी जाती है दो तीन बातें इसमें समझ में जैसी है तेरी तो बात यह सिर्फ हमारे ही देश में शादी की बात होने पर हमेशा धर्म को इतना ज्यादा मान्यताएं महत्व दिया जाता हो ऐसा नहीं है इस संसार में बहुत से बहुत ज्यादा मात्रा में ऐसे देश हैं जहां पर जब भी विवाह की बात हो ना केवल धर्म को बल्कि जाति और संप्रदाय और स्थान को भी मैं तो दिया जाता है केवल धर्म को नहीं तो यह जो प्रश्न है वह से देश वासियों के संबंध में या संदर्भ में पूछा गया हो ऐसा नहीं है 1 साल हम एक प्रश्न है सभी के लिए है सारे देश के लोगों के लिए है सभी व्यक्तियों के लिए है दूसरी बात जो उसमें समझने जैसी है वह यह कि शादी को लेकर के ही केवल धर्म देखा जाता हो या जाति या संप्रदाय देखा जाता है ऐसा नहीं है बहुत से दूसरे भी विषय है जिसमें जिनका चयन करते समय जिनका उपयोग करते समय धर्म जाति संप्रदाय आदि को देखा जाता है जैसे कई लोगों का व्यापार करते हैं तो धर्म और जाति का ध्यान रखते हैं कई लोग किसी की मदद करते हैं तो धर्म का ध्यान रखते हैं कई लोग जब दान देते हैं दान देते समय भी लोग धर्म का ध्यान रखते हैं जाति को संप्रदाय को धर्म को मान्यता देते हैं यहां तक कि सामाजिक व्यवहार में भी यूं कह सकते हैं मित्र बनाने में या शिक्षक का चयन करने में शिक्षा का चयन करने तक में भी धर्म संप्रदाय आदि को मान्यता दे दी जाती है और यदि से नहीं है इसकी यह प्रथा जो है जब से मानव सभ्यता विकसित हुई है उसके विकास से लेकर की यह प्रक्रिया चलती आ रही है तीसरी जो बात है इसमें समझने जैसी वह यह है कि धर्म का मूल स्वरूप में परिभाषा क्या है यदि हम इस बात को समझ सके तो बड़ा सरल होगा कि सामान्य व्यक्ति के जींस में डीएनए में या मन के बिल्कुल आंतरिक स्तर पर धर्म को लेकर के इतनी प्रगाढ़ता और इतनी निष्ठा क्यों है क्यों अपनाया जाता है यदि हम इस बात को समझ सकें कि धर्म का मूल स्वरूप क्या है परिभाषा क्या है तो हमारे लिए आसान हो जाएगा और फिर हमें इसमें दोष नहीं देखेगा यह जो हमें शुरुआत में दोष देता है कि हम या कोई भी व्यक्ति कोई भी कार्यकर्ता धर्म को आगे तक के क्यों करता है तो उसमें हमें सरलता से समझ में आ जाएगी बात देखिए धर्म का जो मूल अर्थ होता है वह होता है आपके स्वाभाविक गुण आपके प्राकृतिक गुण मतलब आप जन्म से जिस जाति से संबंध रखते हैं जाति से मेरा मतलब जैसे आप मनुष्य हैं दूसरे पशु हैं तीसरे पक्षी है कि मकोड़े की जाती अलग है सांप की जाती है लगे मछलियों की जाती है लगे इस तरीके से जन्म से हम जिस जाति में जन्म लेते हैं जन्म से ही हमारा एक स्वाभाविक गुण होता है प्रकृति ने हमें कुछ विशिष्ट गुण दे रखे हैं तो प्रकृति ने जो यह में गुण दिए हैं यह स्थान स्थान पर बदलते हैं जिसे एक उदाहरण दे दूं मैं आपको मान लीजिए कि आपने अगर अरब में जन्म लिया है तो वहां पर मरुस्थल ज्यादा है वहां पर गर्मी ज्यादा है तो आपके शरीर की संरचना वहां के आसपास की वनस्पतियों की संरचना वहां के स्थान की संरचना वहां के पर्यावरण की संरचना अलग है तो उसका प्रभाव आपके शरीर पर पड़ता है ठीक इसी प्रकार आपने अगर भारत देश में जन्म लिया है तो यहां पर पर्याप्त है कृषि कि यहां पर वनस्पतियों की पर्याप्तता है यहां कब पर्यावरण भी बहुत ज्यादा संपन्न है यहां पर छह ऋतु में होती हैं और यदि आप किसी ऐसे देश में जन्म लेते हैं जहां पर केवल बर्फी बर्फी तो वहां का पर्यावरण विनय है वहां पर वनस्पतियों की भी बनता है तो अलग-अलग देश और स्थान पर पैदा हुए लोगों की शारीरिक संरचना है उस पर उसका प्रभाव पड़ता है और शारीरिक संरचना नहीं मन पर भी उसका प्रभाव पड़ता है और साथ ही साथ हम भोजन में क्या चयन करते हैं या हम वस्त्रों में क्या चयन करते हैं और फिर उसका हमारे शरीर और मन पर फिर आगे क्या प्रभाव पड़ेगा इन सब बातों का हमारे शरीर और मन पर जो प्रभाव पड़ता है वह हमारे स्वभाव कैसा बन जाता है वो हमारे गुण बन जाते हैं अब मान लीजिए कि कोई व्यक्ति जिसने जन्म लिया हो भारतवर्ष में जहां पर वनस्पतियों की बहुलता है आबोहवा भी बहुत अच्छी है अगर उसको किसी ऐसे देश में रहने के लिए सारी जिंदगी रहने के लिए चले जाना पड़े जहां पर केवल और केवल मरुस्थल हो तो आप सोचिए वहां पर जीवन जीने की उस वक्त कितना कष्ट उसका जो स्वाभाविक विकास है जो मन मानसिक विकास है जो शारीरिक विकास हुई है जो बौद्धिक विकास है उसमें कितनी बाधाएं आएंगी आएंगी वह सरलता से अपने जीवन को यहां विधाता हुआ अपना जो बौद्धिक और मानसिक विकास कर सकता था जब वह किसी दूसरे ऐसे देश में जाएगा जहां पर ऐसी वनस्पतियों की बहुलता नहीं होगी बहुत ज्यादा खानपान को नहीं मिलेगा और आबोहवा भी उसके बिल्कुल प्रतिकूल होगी उसके विपरीत होगी उसको बड़ी तकलीफ देगी तो ऐसे भी उसका पूरा विकास नहीं हो सकता इस दृष्टि से धर्म का जो सबसे बड़ा प्रभाव अगर हमारी जीवन शैली के किसी विषय पर पड़ा है तो वह विवाह पर पड़ा है और वह लंबे समय से इसी बात को लेकर के पड़ा है और आज का जो युग है वह ग्लोबलाइजेशन का योग है आज के युग में सभी जगह वैश्वीकरण हो जाने के कारण हर एक वस्तु सरलता से सामान्यतः उपलब्ध है फैसिलिटी बहुत ज्यादा है हर एक स्थान पर इंटरनेट का युग है मैं समझता हूं ऐसे समय में जो धर्म की मान्यताएं हैं शादी को लेकर के वह पहले से कम भी हुई है कारण नहीं है कि क्योंकि अब हम किसी भी स्थान पर सरलता से सरवाइव कर सकते हैं तो इस वजह से जो हमारे स्वाभाविक गुण है या जो हमारा धर्म है वह हमें ज्यादा परेशानी नहीं देता है इस कारण से जो जागरूक और बौद्धिक वर्ग उसने आज शिक्षित हो जाने के कारण से इस बात को समझा है कि जो धर्म का मतलब होता है वह मूलभूत रूप से प्राकृतिक या स्वाभाविक गुण होते हमारे शरीर के हमारे मन के मारे बुद्धि के तो आज क्योंकि विश्व में इसकी कोई परेशानी नहीं है हम जहां पर भी जाएं सरवाइव कर सकते हैं हमें सब चीजें मिल सकती हैं तो एक जो बौद्धिक वर्ग है उसने अब यह धर्म को मान्यता देना बंद कर लिया है शादी के विषय को लेकर के लेकिन फिर भी क्योंकि लंबे लाखों वर्षों की जो परंपरा है हमारे अंदर चली आ रही और वह रूढ़िवादिता से पालन की जाती आ रही है इस कारण से यह भी एक तथ्य है कि हम धर्म को अधिक महत्व देते हैं खासकर के विवाह के विषय में एक दृष्टि से हम इसे सकारात्मक रूप से ले सकते हैं जैसा कि शास्त्रों में भी लिखा हुआ है कि तारे यदि इति धर्म धर्म है जिसे धारण किया जा सके यह स्वभाव का हिस्सा है अगर मुझसे सरलता से धारण कर सकते हैं तो वह हमारे लिए धर्म है तो हमें देखना पड़ेगा कि हमारे गुण क्या है हम किस तरह से इसी पर्यावरण में सरवाइव कर पाते हैं उसके आसपास के कर पाते हैं वातावरण को स्वीकार कर पाते हैं या नहीं कर पाते हैं तो मूल रूप से यहां पर जो है गुणों से संबंधित बात है अगर आप के गुण शारीरिक और मानसिक गुण और बहुत एक और जो है बौद्धिक गुण जो है वह आपके पार्टनर से मिलते हैं तो निश्चित रूप से हमें व्यवहार कर लेना चाहिए शादी कर लेनी चाहिए और धर्म को मान्यता देकर के की शादी की कैलाश जी धन्यवाद

namaste main doctor sunil ke vaidik aapke prashnon ke samadhan me punh prastut hoon aap ne prashna kiya hai jab bhi hamare desh me shaadi ke baad hoti hai toh hamesha dharm ko itna zyada manyata kyon di jaati hai do teen batein isme samajh me jaisi hai teri toh baat yah sirf hamare hi desh me shaadi ki baat hone par hamesha dharm ko itna zyada manyatae mahatva diya jata ho aisa nahi hai is sansar me bahut se bahut zyada matra me aise desh hain jaha par jab bhi vivah ki baat ho na keval dharm ko balki jati aur sampraday aur sthan ko bhi main toh diya jata hai keval dharm ko nahi toh yah jo prashna hai vaah se desh vasiyo ke sambandh me ya sandarbh me poocha gaya ho aisa nahi hai 1 saal hum ek prashna hai sabhi ke liye hai saare desh ke logo ke liye hai sabhi vyaktiyon ke liye hai dusri baat jo usme samjhne jaisi hai vaah yah ki shaadi ko lekar ke hi keval dharm dekha jata ho ya jati ya sampraday dekha jata hai aisa nahi hai bahut se dusre bhi vishay hai jisme jinka chayan karte samay 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