मनुष्य को समाज की आवश्यकता क्यों है?...


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सुरेन्द्र पाल गुप्ता

रिटायर्ड प्रधानाचार्य

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आपने पूछा है कि मनुष्य को समाज की आवश्यकता क्यों है मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है मैं समाज में रहना चाहता है अरे सुनिए का था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है बस मार्ग में रहना चाहता है यदि जंगल में रहता है कि आपस में मनुष्य परिवार में बहुत कुछ सकता है परिवार में माता को कम शिक्षिका होती है परिवार में रहकर समाज में आता है समाज में व्यक्ति को भी कुछ मिलता है मनुष्य को समाज की भूत दिखा सकता समाज से सहयोग से मिलता है समाज में ही उसे प्रेम मिलता है त्याग मिलता है अनुभूति मिलती है समाज के माध्यम से विद्या व्यवस्था समाज में बहुत कुछ सीखता है समाज एक बड़ी व्यवस्था जिस समाज में रहता है मैं उसका समाधान समीर भी उसके समाज के लोग रहते हैं समाज के माध्यम से व्यक्ति की सारी आवश्यकताएं पूरी होती है समाज संस्था है जो व्यक्ति के विकास के अंदर व्यक्ति के दैनिक जीवन के अंतिम व्यक्ति के हर कदम पर उसका सहायक होता है अतः समाज के बिना मनुष्य की हम कल्पना ही नहीं कर सकते हैं समाज बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है अतः समाज के साथ व्यक्ति को तालमेल बिठाना चाहिए और उस तालमेल के माध्यम से ही व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास समाज में ही संभव है धन्यवाद

aapne poocha hai ki manushya ko samaj ki avashyakta kyon hai manushya ek samajik prani hai main samaj me rehna chahta hai are suniye ka tha ki manushya ek samajik prani hai bus marg me rehna chahta hai yadi jungle me rehta hai ki aapas me manushya parivar me bahut kuch sakta hai parivar me mata ko kam shikshika hoti hai parivar me rahkar samaj me aata hai samaj me vyakti ko bhi kuch milta hai manushya ko samaj ki bhoot dikha sakta samaj se sahyog se milta hai samaj me hi use prem milta hai tyag milta hai anubhuti milti hai samaj ke madhyam se vidya vyavastha samaj me bahut kuch sikhata hai samaj ek badi vyavastha jis samaj me rehta hai main uska samadhan sameer bhi uske samaj ke log rehte hain samaj ke madhyam se vyakti ki saari aavashyakataen puri hoti hai samaj sanstha hai jo vyakti ke vikas ke andar vyakti ke dainik jeevan ke antim vyakti ke har kadam par uska sahayak hota hai atah samaj ke bina manushya ki hum kalpana hi nahi kar sakte hain samaj bahut hi mahatvapurna ang hai atah samaj ke saath vyakti ko talmel bithana chahiye aur us talmel ke madhyam se hi vyakti apne vyaktitva ka purn vikas samaj me hi sambhav hai dhanyavad

आपने पूछा है कि मनुष्य को समाज की आवश्यकता क्यों है मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है मैं समाज म

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