नकारात्मक सोच क्या है?...


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J.P. Y👌g i

Psychologist

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प्रश्न या नकारात्मक सोच क्या होती है नकारात्मक सूची होती है कि जो हम करने जा रहे होते हैं तो उसमें एक भी खान के रूप में प्रसूति आ जाती है कि हमारे मनों को दबा देते हैं मनोबल को और से हट जाते हैं जो हमारा लक्ष्य भेदन होता है वह टारगेट को हिला देती है अक्सर नकारात्मक सोच तो ज्ञान के अभाव में अक्सर ये होता है और जिनके अंदर पुरुषार्थ की कमी होती है यार अपने अनुशासन में सिद्धांत मैं झूठ नहीं होते हैं तो उनमें एक सकारात्मक सोच उत्पन्न होती रहती है और यह हमारी कमजोरी की विधि है क्योंकि हमारा मानसिक सूची तुरंत दुर्बल और कमजोर होता है कि जो कुछ चीजों से बचना चाहता है क्योंकि इसमें आलस्य प्रमाद बहुत बड़ी चीज होते हैं डर भी होता है हम रिक्स नहीं उठा पाते हैं और उसमें आगे से प्रस्तुति बनी रहती है कि ऐसा होगा वैसा होगा इसके अंदर सोचे आप मत कीजिए कि ज्यादा भूमिका आती है मस्तिष्क से तो नकारात्मक विचार का रोग के लक्षण में होते हैं क्योंकि उनके उनका मन और बुद्धि उस पर ही एक डरावना था चला जाता है और हम उसे नकारात्मक सोच के कारण किसी कार्य में उन्नति नहीं कर पाते हैं सब चीजें हैं क्योंकि हम साथ ही नहीं होते हमारे अंदर पराक्रम की कमी होती है हमारे अंदर एक निर्णय क्षमता नहीं होती है और हमारे विश्वास और आस्था का कोई बल नहीं होता इस आधार पर हम जाकर विचलित रहते हैं और मन चंचल होता रहता है और उसी में ही मटका में उलझे रहते हैं क्योंकि उनके अंदर अपनी स्थिरता की कोई फूल जी नहीं होती है और मर्यादा का कोई ज्ञान नहीं होता अधिकांश उनके अंदर यह नकारात्मक सोच आती रहती हैं और दूसरी बात रिफ्लेक्ट माइंड में हम दूसरे को देख कर सोचते हैं अवधारणा बना लेते हैं कि यह चीजें मेरी देश प्रतिकूल कर रही है और उसमें हम अपने से क्षमता को हीन कर देते हैं अपने आप को संघर्षरत नहीं हो पाते हैं तो उसमें नकारात्मक सोच जो होते हैं हमारे को कुंठित करती है कि रहते हैं इसलिए विकास में और उद्धव होते हैं क्योंकि सोच एक बहुत बड़ी चीज होती है जेहन में जिस तरह प्रतिक्रियाएं होती है जैसे गुस्सा आ गया तो उसकी प्रतिक्रिया में हम कुछ ना कुछ उद्गम सील हो जाते हैं तो इसी तरह यह है चीज है कि जो हमें डरा कर हमारे को अपने उद्यम से रोका वर्ड में डालती है तुम जो भी चीज है वह नकारात्मक सोच हमारे उद्योग मृत्यु को नहीं बढ़ने देती तो उसमें पहले से ही एक सुरक्षात्मक और भ्रम की गुंजाइश से उत्पन्न की रहती है तो इसमें हम पैसे लेकर स्थिति में नहीं रहते और कुछ जैसे मैंने कहा कि पराक्रम की कमी होती है तो ऐसी भावनाओं से जोशीन लोग होते हैं उनके अंदर आ अलग अक्सर यही प्रस्तुति दिमाग बनाता है और हम ज्यादातर शिकार होते हैं और स्वयं बचाव के लिए अपने आप को प्रेरित नहीं करते हैं तो यह सारे लक्षण और नकारात्मक सोच की होती है यही चीज है कि आप उनको से हटने के लिए आपने आपको जुगाड़ बनाया हमारे अंदर ऐसा होना चाहिए जो हमारे विकास चुनौती के और सृजन करने वाली ऊर्जा उत्सर्जित करते रहे दिमाग एक खेल है जो वह चलता है तो फिर उसी रूप में ज्यादातर अपने को प्रभाव मान बनाए रखता है तो यह सारी चीजें हैं कि अगर आपको कोई दायरा नहीं मिला कोई उन्नति का रास्ता नहीं मिला हुआ है हम भटकाव के जीवन में ज्ञापन कर रहे हैं अथवा अधिकांश नकारात्मक सोच की उपज बढ़ती है और यह इस प्रकार होता है जिस तरह खरपतवार उत्पन्न होते हैं और आपकी जो 721 सामर्थ वह चीज उर्जा होती है वह वह उसमें पंडित होकर हराश करती रहती है फिर से फायदा नहीं होता यह नकारात्मक सोच का परिणाम होता है प्रजापति पोस्टेड चिल्लाती है हमें से विचारधारा है और भावनाएं उसके संगठन में होना चाहिए नकारात्मक सोच हमेशा हमेशा आलस की ओर ढकेल दिया डर की ओर ढकेल दिया प्रमाद की ओर ढकेल देती है तो ही यह इतना पूछ सकता की स्थिति में प्रभाव मान कर देती है तो इसमें कर्मठता नहीं हो पाते हैं यह सारी चीज है सोच है लेकिन कभी-कभी जब अगर पढ़ना आना को लेकर हम चिंतित होंगे तो आगे हम ऐसी नकारात्मक सोच के लिए पहले से भविष्य के लिए अगर हम तैयारी कुछ करते हैं तो यह नकारात्मक सूची रद्द होती हैं तो यही चीज है कि फर्क समझना जरूरी है कि यह नकारात्मक सोच हमारे अंदर से उत्पन्न हो रही है और हमेशा मानते हैं कि बाहरी मंडल से हमारे को यह गतिविधि मिल रही है लेकिन ऐसा होता नहीं है परमात्मा की सोच बुद्धि का प्रणाम है जिससे कि हमें ऐसे अवधारणा बनाते हैं लेकिन निश्चित इसका विच्छेद अन करना चाहिए और आगे प्रवेश की ओर कुछ नए संकल्प धारा को प्रवाहित करना चाहिए नकारात्मक सोच ही मनुष्य को पीछे ढकेल ए रहती है तो यह चीज और कहां से रही हमारी ही बुद्धि से प्रस्तुत हो रहा है हमारे संस्कार अंतरण की भावनाओं से अवधारणाओं से यह प्रतीत हो रहा है पर इसका हटाना चाहिए कुछ न कुछ प्रसाद सामल से ऐसा कार्य करना चाहिए कि हमारी योजना चली है वह बदलाव में आएं अन्यथा यह सोच आपको वही रुकावट के मार्ग में पड़ी रहेगी बस अपने विचार को जागृत कीजिए और इस तथ्य को समझने कि मुझे मेरा लोकेशन क्या और अध्यात्म ज्ञान के के पथ पर चलकर अपने आप को सामर्थ की दशा को प्रगट प्रकट करना चाहिए और उसके अनुभूतियां नीचे तो आपके अंदर यह नकारात्मक सोच वेतन वृद्धि हो जाएगी और आप उस पुरुष को अपने अंदर से अपनी इच्छाओं से समझते हो उस पर प्रभावित ना बने और यह सोच को डिस्ट्रॉय करना चाहिए यह चीज हमारे अंदर से अपने आप में अपने आप को डस्ट रही है जिस पर एक भी जहरीला नाग होता है तो जबरदस्त लेता तो उसका जहर का रिश्ता होता उसका प्रभाव हमारे मित्र मंडल में व्यापकता के साथ प्रवेश करा जाता है प्रवेश कर जाता है तो ऐसी चीज को हम पहले से ही सुरक्षित भाव से बचाव में रखना चाहते और फिर जब आपको यह चीज पर आ जाएगी कि विवेक की तरफ से यह सोच हमें कहां ले जाएगी तो हम सोच का दायरा और आ कहां से आया कौन से चौराहा है कॉल स्त्री की चीज हमारे पेज आच्छादित हो रही है कहां से हो रही है कृपया अधिवेशन में आप देखेंगे तो हम पाएंगे कि यह हमारे अंदर की कमी का स्रोत छोटा हुआ इसको बंद करना से नकारात्मक सोच का सृजन होता रहता है तो बदलाव के लिए कुछ न कुछ सोच के साथ अपने आप को चुनाव करना चाहिए कि कहां से हमारे को मजबूती मिलेगी तो इन दोनों के समझ में आप कहीं ना कहीं स्थापित कर पाएंगे तो इतनी विवेचना में शायद आपको कुछ समझ आ रहा है कि नकारात्मक सोच क्या होती है धन्यवाद

prashna ya nakaratmak soch kya hoti hai nakaratmak suchi hoti hai ki jo hum karne ja rahe hote hain toh usme ek bhi khan ke roop mein prastuti aa jaati hai ki hamare manon ko daba dete hain manobal ko aur se hut jaate hain jo hamara lakshya bhedan hota hai vaah target ko hila deti hai aksar nakaratmak soch toh gyaan ke abhaav mein aksar ye hota hai aur jinke andar purusharth ki kami hoti hai yaar apne anushasan mein siddhant main jhuth nahi hote hain toh unmen ek sakaratmak soch utpann hoti rehti hai aur yah hamari kamzori ki vidhi hai kyonki hamara mansik suchi turant durbal aur kamjor hota hai ki jo kuch chijon se bachna chahta hai kyonki isme aalasya pramad bahut badi cheez hote hain dar bhi hota hai hum riks nahi utha paate hain aur usme aage se prastuti bani rehti hai ki aisa hoga waisa hoga iske andar soche aap mat kijiye ki zyada bhumika aati hai mastishk se toh nakaratmak vichar ka rog ke lakshan mein hote hain kyonki unke unka man aur buddhi us par hi ek daravna tha chala jata 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majbuti milegi toh in dono ke samajh mein aap kahin na kahin sthapit kar payenge toh itni vivechna mein shayad aapko kuch samajh aa raha hai ki nakaratmak soch kya hoti hai dhanyavad

प्रश्न या नकारात्मक सोच क्या होती है नकारात्मक सूची होती है कि जो हम करने जा रहे होते हैं

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