क्या मानव समाज पतन की और जा रहा है?...


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J.P. Y👌g i

Psychologist

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प्रश्न आ रहा है कि क्या मानव समाज पतन की ओर जा रहा है तो इस संसार में समाज में सब चीज दिखा जा रहा है लो पतन की ओर भी जा रहे हैं और उन्नत में भी जा रहे हैं ऐसा नहीं है कि एक ही ढर्रे पर चल रहा है लेकिन सबसे विशेष बात ही होती कि समाज के प्रति हम जो भावनाएं रखते तो अपने आप को भी तो एक उसमें जुड़ना चाहिए कि मैं भी तो एक समाज हूं तू जो स्वयं को समझने लग गए हैं कि मैं सामाजिक प्राणी है और उसके रूप में ही मुझे कुछ ना कुछ भावना उत्पन्न करनी चाहिए तो समाज में समाज का हुआ तो हमारी मानसिकता होती है कि यह कैसा हो रहा है समाज का दृष्टिकोण दृष्टिकोण होता है हमारे को किस रूप में काम अवलोकन कर रहे हैं उस रूप से हमें समाज अधिकांश दिखाई देता है तो अगर हमारी दृष्टिकोण कुछ और उन्नत की ओर देख ली तो उस तरह की चीजें में सफल होते हैं तो हमारा एक तो सेम का नजरिया होता है कि समाज में हम क्या देख पा रहे हैं और हम क्या देखना चाहते हैं तो हमें समाज में सबसे बड़ी बात आती है जब ऐसी चीजें आती हैं तो वह इंडिकेशन में पड़ता है क्योंकि हम भी समाजिक है तो हम अपने से भिन्न करके समाज को देख रहे हैं और हम अलग हैं उनसे तो हमें लगेगा कि क्या हुआ है कि बहुत बड़ा पतन की ओर जा रहे हैं लेकिन इसमें पर्टिकुलर की है कि हर एक नागरिक समाज में अगर अपने दायित्व को समझकर शाम से सन की जागृति हुई है जन-जन की जागृति हो रही है तो समाज शिक्षा के बिना संभव नहीं हो सकता है तो जो शिक्षित वर्ग के समान होंगे और समझदार लोग होंगे वह अपनी शैली को जरूर परिवर्तित करते हैं और प्रत्येक 11 जन से समाज का समूह उत्पन्न हो लेकिन जिस की बहुलता होती है तो उसकी और हमें ऐसा कहते हैं कि यह समाज विकास की ओर जा रहा है दूसरा यह समझते हैं कि यह पतन की ओर जा रहा है तो इसके मूल का कारण है कि समाज में जैसे संस्कारों का प्रचलन होता है उसी के हिसाब से सामान्य की समाज की मान्यता बनती है तो उसमें क्या होता है उसमें प्रतिजन होते हैं तो उसमें हम समाज में किस को सम्मान देते हैं आजकल के समाज में देखते हैं बुरा करने वाले थोड़े दिन के पैसे का ऐश्वर्या तो समाज उसको मान्यता कौन दे रहा हमारे जन जन लोग कहते हैं वह बहुत अच्छा प्रोग्रेस कर रहा है उसने बहुत बना लिया है बहुत संग्रह कर लिया लेकिन उसकी समाज में कोई भी भूमिका नहीं रहता था तो किसी की एक इंसान की मदद करने योग्य नहीं होते हैं और हम अपने दिमाग से उनको बहुत बड़प्पन की अवधारणा में स्थापित रखते हैं तो ऐसा नहीं होना चाहिए समाज में मानवता की भावना को देखना चाहिए कौन व्यक्ति कितने आदर्श से जी रहा है और उनके अंदर कितनी सहानुभूति यां हैं और वह कितनी मदद कर पा रहा है तो सामाजिकता में यही आता है कि हमें सम्मान की शैली को जागरण करना चाहिए जिससे कि कल्याण की अवस्था उत्पन्न हो तो यह समाज का अर्थ सिर्फ यही होता है कि जन जन तक प्रत्येक जन प्रत्येक व्यक्ति एक भिन्न होता है लेकिन एक सामूहिक रूप से जो प्रदर्शन चलता समाज की दिशा को बताता है कि समाजा से जा रहा तो वह जागृति आना चाहिए कल्याण होना चाहिए मानव जीवन में मनुष्य का जीवन अनमोल होता है और उसके अंदर यही होना चाहिए कि प्रत्येक मानव में एक निष्ठा बननी चाहिए कि मेरी भी प्रयुक्ति कल्याण में हो जाए तो समाज सताई सुधरता चला जाएगा कि और रही बात हम सोचे कि एक जनसमूह को एकदम किसी ट्रेन में बैठा कर दूसरी दिशा में ले जाएं तो ऐसा नामुमकिन है क्योंकि समाज अपनी बुद्धि के दायरे में ज्ञापन कर रहा है प्रत्येक व्यक्ति यही है कि उसमें अगर प्रत्येक व्यक्ति में अच्छे अवधारणाएं हो जाए उन्नत की संख्या इनका विकास मूल बड़े तो वह समाज सही दिशा में जाएगा नेता तो पतन की ओर जाएगा यह सहज और स्वाभाविक है दीपक करती क्या चाहती है मनुष्य क्या चाहता किसको सहज में और अपनी इच्छा के मनमानी पूर्ण ढंग से उसको प्राप्त हो जाए तो उसमें जो भी कुछ उनके अंदर हथकंडे होते हैं वह आनन-फानन में अनुशासन और कानूनी इत्यादि दायरे से गिर गिर जाते हैं और वह अपने बिल आशाओं के पूर्ण करने की युक्ति बनाते हैं इसमें अनाचार होता है यह पतन का कारण बनता है इत्यादि बहुत सारी बातें हैं जो कि सामाजिक विचार धाराओं की बुराइयां है जिसके जो समझदारी शैली बन रही है वह इस दर्द को समझ कर कहीं ना कहीं अपना अगर एक-दो व्यक्ति के प्रति भी आ गया शिव परिचर्चा छेड़े तो समाज एक एक मंच के व्यक्ति बिंदु से आगे विकास की ओर उन्मुख हो सकता और बुराइयों को त्याग कर सकता है तो इतना आपस में लड़ने से झगड़ने से किसी को कष्ट देने से अत्याधिक नैतिक चरित्र बीच में बहुत जिम्मेदार होता है तो यह सारी चीज है कि हम मान्यता क्यों देने हैं किसको दे रहे हैं समाज में प्रत्येक आदमी का ढंग बनता है और संयम से रहना और अपने आप में नियंत्रण होकर रहना स्वयं में अपने आप को बदलाव करना ही समाज समाज का तो ढंग ली है कि किसी ना किसी का अनुकरण करना ही है तो हम हैं समाज के अंदर अगर कोई अच्छी सैलरी अच्छे गुण है अगर उसके सम्मान करने कि हमारे अंदर भावनाएं उत्पन्न हो भेदभाव रहित हो और उनको बढ़ाई जाए तो यह समाज सोता ही पतन से बचेगा अन्यथा अपने आप में और गलत का संगत साथ कोई नहीं तथा अंत काल में भी डूबने वाले को कोई नहीं बचा था जो अपने ही मूर्खता फिर डूबता है तो ऐसी बात नहीं है तो समाज को एक दिन सुधारना ही पड़ेगा इसके ईश्वर और प्रकृति कुछ ना कुछ दुर्घटनाएं जगत में स्थापित है जिससे आदमी चेंज होगा लेकिन बशर्ते यह है कि लोग भी व्यक्ति पहले जीत जाते हैं और जिनके अंदर ठोकर लगती है तब जीते हैं फर्क इतना ही पड़ता है लेकिन जो विवेक से सोचता है कुछ करता है तो उसका समय बचत हो जाती है और बहुत सी दुर्घटनाएं कम हो जाते हैं लेकिन उत्पीड़न ना और दुखी उन्मुख कराती हैं तो कर्म कर्म के परिणाम उनको उसी दिशा की ओर होगा हर जीव-जंतु प्राणी संतोष शांति चाहता है तो बेशक किसी एक मानसिक सोच के आधार पर आपने विकास की जो हम कर्म को स्थापित करने के हमें विकास करना हमारे को आनन-फानन में मातृछाया बना लेती है और 30 समिति क्षमता नहीं होती और उसका सही तौर तरीका ढंग नहीं होता गलत चीजें एक प्यार करते हैं सोच शादी तो उससे वोपन का पतन का रास्ता होता क्योंकि हर कर्म का परिणाम मनुष्य को सपा ही भोगना पड़ता है तो जोर जब जन-जन की जागृति नहीं होगी और अपने साथ और मर्यादा की ज्ञान नहीं होगा आपने मनुष्य को अपने प्रति सम्मान की दृष्टि नहीं होगी तो वह जगत के लोग जो समाज है वह सुधारने में जाएंगे तो यही चाहते हैं कि यह विषय ऐसा होता है कि प्रत्येक मनुष्य मैच में संकल्प बाद होगा तो समाज का नजरिया बदलेगा और हम जैसा देखना चाहेंगे और जैसा हम बनाना चाहेंगे हमें वैसा ही है बार-बार उस वातावरण का सृजन करना चाहिए ध्यान करना चाहिए और चिंतन सीन होना चाहिए चिंता है और इससे कुछ निष्कर्ष निकलता है तो उस स्वयं राह बनाता चलता है लेकिन हमें कुंठित नहीं होना चाहिए तो प्रत्येक मनुष्य जग में सचेत होगा और कुछ आपसी तालमेल के संस्कार जागृत होंगे तो समाज सुधरेगा नेता तो फिर जैसा भी है वह देखना है लेकिन दुख होता है जो समझदार होते हैं उनको लगता है कि समाज गलत दिशा में ना जाए और आगे उत्तम और अच्छा वातावरण सृजन हो तो यही है मेरे सवाल की वेदना है और ज्योति उत्तर है मैं यही कहना चाहता हूं धन्यवाद आप सबको शुभकामनाएं

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dhanyavad aap sabko subhkamnaayain

प्रश्न आ रहा है कि क्या मानव समाज पतन की ओर जा रहा है तो इस संसार में समाज में सब चीज दिखा

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