क्या अधिक आध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीज़ों को त्यागना आवश्यक है यदि हाँ, तो क्यों?...


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नमस्कार आपका प्रश्न है क्या अभी अध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों को त्यागना आवश्यक है यदि हां तो क्यों देखिए ऐसा कुछ नहीं है आप भौतिक वस्तुओं के साथ रहकर भी अध्यापकों के रास्ते पर आगे बढ़ सकते हैं जैसा कि अष्टावक्र और राजा जनक के संभाग से पता चलता है इसलिए यदि आप सोचते हैं कि भौतिक चीजों का त्याग करने के बाद में आप अध्यात्म के रास्ते पर ज्यादा आगे बढ़ जाएंगे ऐसा जरूरी नहीं है आपके पास कमबख्त हुए हो परंतु आपका उसकी तरफ भी ज्यादा कठिन हो सकता है इसलिए यह गलतफहमी आप निकाल दीजिए दूसरा व्यक्ति जब अपनी चीजों के साथ में बहुत ज्यादा मुंह रखता है तब समस्या होती है यदि व्यक्ति उन चीजों का उपयोग कर रहा है तो कहीं ना कहीं उसमें कोई समस्या नहीं है जैसे कि मुझे एक कहानी याद आती है एक राजा थे और उनके गुरु जंगल में रहते थे राजा और गुरु का बहुत प्रेम था एक बार राजा ने गुरु को कहा कि आप मेरे साथ मेरे महल में चलो गुरु बहुत पहुंचे गुरुदेव ठीक है आप चलिए गुरु राजा के महल में पहुंचा और खूब अच्छे तरीके से रहने लगा ऐसो राम भूमि लगा राजा को लगाया गुरु तो गुरु है इसको जैसे ही आराम मिला यह सब भूल गया अब उसके मन में कुछ ना कुछ उसके बारे में बुरे ख्याल है और उनको बोल भी ना पाए अब एक बार उनके मन में बात यही है कि जैसे मैं चीजों को भोग रहा हूं वैसे ही आप भोग रहे हो तो आप पर और मुझ में क्या फर्क हुआ गुरु ने कहा फर्क बहुत है क्या फर्क है तूने अपनी कुटिया में पुराना मैं कैसे अपना महल छोड़ सकता हूं उसे क्या जैसे मैंने थोड़ा वैसे तुम भी छोड़ दो मुझको और तुम्हें कोई फर्क नहीं है तो राजा ने कहा नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता मैं कैसे छोड़ दूंगा मैं फ्रेंड सकता तब साधु ने कहा मुझ में यही फर्क है जब तुमने कहा वह चीज ग्रहण कर लो तो मैंने बिना पूछे ज्यादा समय लगा है उसको घर आपने बोला भाई छोड़ दो तो मैंने तनिक भी देर लगा है उसको छोड़ दिया परंतु तुम ऐसा नहीं कर सकते यही तुम में और मुझ में फर्क है धन्यवाद

namaskar aapka prashna hai kya abhi adhyatmik hone ke liye bhautik chijon ko tyagna aavashyak hai yadi haan toh kyon dekhiye aisa kuch nahi hai aap bhautik vastuon ke saath rahkar bhi adhyapakon ke raste par aage badh sakte hain jaisa ki ashtavakra aur raja janak ke sambhag se pata chalta hai isliye yadi aap sochte hain ki bhautik chijon ka tyag karne ke baad me aap adhyaatm ke raste par zyada aage badh jaenge aisa zaroori nahi hai aapke paas kamabakht hue ho parantu aapka uski taraf bhi zyada kathin ho sakta hai isliye yah galatfahamee aap nikaal dijiye doosra vyakti jab apni chijon ke saath me bahut zyada mooh rakhta hai tab samasya hoti hai yadi vyakti un chijon ka upyog kar raha hai toh kahin na kahin usme koi samasya nahi hai jaise ki mujhe ek kahani yaad aati hai ek raja the aur unke guru jungle me rehte the raja aur guru ka bahut prem tha ek baar raja ne guru ko kaha ki aap mere saath mere mahal me chalo guru bahut pahuche gurudev theek hai aap chaliye guru raja ke mahal me pohcha aur khoob acche tarike se rehne laga aiso ram bhoomi laga raja ko lagaya guru toh guru hai isko jaise hi aaram mila yah sab bhool gaya ab uske man me kuch na kuch uske bare me bure khayal hai aur unko bol bhi na paye ab ek baar unke man me baat yahi hai ki jaise main chijon ko bhog raha hoon waise hi aap bhog rahe ho toh aap par aur mujhse me kya fark hua guru ne kaha fark bahut hai kya fark hai tune apni kuttiya me purana main kaise apna mahal chhod sakta hoon use kya jaise maine thoda waise tum bhi chhod do mujhko aur tumhe koi fark nahi hai toh raja ne kaha nahi nahi aisa nahi ho sakta main kaise chhod dunga main friend sakta tab sadhu ne kaha mujhse me yahi fark hai jab tumne kaha vaah cheez grahan kar lo toh maine bina pooche zyada samay laga hai usko ghar aapne bola bhai chhod do toh maine tanik bhi der laga hai usko chhod diya parantu tum aisa nahi kar sakte yahi tum me aur mujhse me fark hai dhanyavad

नमस्कार आपका प्रश्न है क्या अभी अध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों को त्यागना आवश्यक है यद

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