क्या अधिक आध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीज़ों को त्यागना आवश्यक है यदि हाँ, तो क्यों?...


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नमस्कार आपका प्रश्न है क्या अभी अध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों को त्यागना आवश्यक है यदि हां तो क्यों देखिए ऐसा कुछ नहीं है आप भौतिक वस्तुओं के साथ रहकर भी अध्यापकों के रास्ते पर आगे बढ़ सकते हैं जैसा कि अष्टावक्र और राजा जनक के संभाग से पता चलता है इसलिए यदि आप सोचते हैं कि भौतिक चीजों का त्याग करने के बाद में आप अध्यात्म के रास्ते पर ज्यादा आगे बढ़ जाएंगे ऐसा जरूरी नहीं है आपके पास कमबख्त हुए हो परंतु आपका उसकी तरफ भी ज्यादा कठिन हो सकता है इसलिए यह गलतफहमी आप निकाल दीजिए दूसरा व्यक्ति जब अपनी चीजों के साथ में बहुत ज्यादा मुंह रखता है तब समस्या होती है यदि व्यक्ति उन चीजों का उपयोग कर रहा है तो कहीं ना कहीं उसमें कोई समस्या नहीं है जैसे कि मुझे एक कहानी याद आती है एक राजा थे और उनके गुरु जंगल में रहते थे राजा और गुरु का बहुत प्रेम था एक बार राजा ने गुरु को कहा कि आप मेरे साथ मेरे महल में चलो गुरु बहुत पहुंचे गुरुदेव ठीक है आप चलिए गुरु राजा के महल में पहुंचा और खूब अच्छे तरीके से रहने लगा ऐसो राम भूमि लगा राजा को लगाया गुरु तो गुरु है इसको जैसे ही आराम मिला यह सब भूल गया अब उसके मन में कुछ ना कुछ उसके बारे में बुरे ख्याल है और उनको बोल भी ना पाए अब एक बार उनके मन में बात यही है कि जैसे मैं चीजों को भोग रहा हूं वैसे ही आप भोग रहे हो तो आप पर और मुझ में क्या फर्क हुआ गुरु ने कहा फर्क बहुत है क्या फर्क है तूने अपनी कुटिया में पुराना मैं कैसे अपना महल छोड़ सकता हूं उसे क्या जैसे मैंने थोड़ा वैसे तुम भी छोड़ दो मुझको और तुम्हें कोई फर्क नहीं है तो राजा ने कहा नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता मैं कैसे छोड़ दूंगा मैं फ्रेंड सकता तब साधु ने कहा मुझ में यही फर्क है जब तुमने कहा वह चीज ग्रहण कर लो तो मैंने बिना पूछे ज्यादा समय लगा है उसको घर आपने बोला भाई छोड़ दो तो मैंने तनिक भी देर लगा है उसको छोड़ दिया परंतु तुम ऐसा नहीं कर सकते यही तुम में और मुझ में फर्क है धन्यवाद

namaskar aapka prashna hai kya abhi adhyatmik hone ke liye bhautik chijon ko tyagna aavashyak hai yadi haan toh kyon dekhiye aisa kuch nahi hai aap bhautik vastuon ke saath rahkar bhi adhyapakon ke raste par aage badh sakte hain jaisa ki ashtavakra aur raja janak ke sambhag se pata chalta hai isliye yadi aap sochte hain ki bhautik chijon ka tyag karne ke baad me aap adhyaatm ke raste par zyada aage badh jaenge aisa zaroori nahi hai aapke paas kamabakht hue ho parantu aapka uski taraf bhi zyada kathin ho sakta hai isliye yah galatfahamee aap nikaal dijiye doosra vyakti jab apni chijon ke saath me bahut zyada mooh rakhta hai tab samasya hoti hai yadi vyakti un chijon ka upyog kar raha hai toh kahin na kahin usme koi samasya nahi hai jaise ki mujhe ek kahani yaad aati hai ek raja the aur unke guru jungle me rehte the raja aur guru ka bahut prem tha ek baar raja ne guru ko kaha ki aap mere saath mere mahal me chalo guru bahut pahuche gurudev theek hai aap chaliye guru raja ke mahal me pohcha aur khoob acche tarike se rehne laga aiso ram bhoomi laga raja ko lagaya guru toh guru hai isko jaise hi aaram mila yah sab bhool gaya ab uske man me kuch na kuch uske bare me bure khayal hai aur unko bol bhi na paye ab ek baar unke man me baat yahi hai ki jaise main chijon ko bhog raha hoon waise hi aap bhog rahe ho toh aap par aur mujhse me kya fark hua guru ne kaha fark bahut hai kya fark hai tune apni kuttiya me purana main kaise apna mahal chhod sakta hoon use kya jaise maine thoda waise tum bhi chhod do mujhko aur tumhe koi fark nahi hai toh raja ne kaha nahi nahi aisa nahi ho sakta main kaise chhod dunga main friend sakta tab sadhu ne kaha mujhse me yahi fark hai jab tumne kaha vaah cheez grahan kar lo toh maine bina pooche zyada samay laga hai usko ghar aapne bola bhai chhod do toh maine tanik bhi der laga hai usko chhod diya parantu tum aisa nahi kar sakte yahi tum me aur mujhse me fark hai dhanyavad

नमस्कार आपका प्रश्न है क्या अभी अध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों को त्यागना आवश्यक है यद

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आपका प्रश्न क्या अधिक आध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों को त्यागना आवश्यक है यदि हां तो क्यों देखिए मैं आपको यह बता देना चाहता हूं मैं खुद एक मंदिर का पुरोहित हूं और एक पृष्ठ का अध्यक्ष भी हूं मैंने जो अपने जीवन में अनुभव किया है आध्यात्मिक चीजों को लेकर की भौतिकता और आध्यात्मिकता एक सिक्के के दो पहलू हैं अगर हम भौतिकता को छोड़ते हैं तो ईश्वर द्वारा बनाए गए इस शरीर पर हम दोस्त मरते हैं अनिल ना करते हैं परमात्मा के नियमों की अगर हम केवल आध्यात्मिक ही रास्ते पर बढ़ते हैं तू भी अवहेलना होती है अगर एक सिक्का ₹1 लीजिए एक शेर होता है बकरी होती है अगर आप उसको एक तरफ भेज दीजिए तो कोई भी दुकानदारों से लेगा नहीं बोलेगा भैया यह मिठाई झटके में कभी ले ले तो बात की बात है मगर वह जानकारी है तो नहीं लेगा तो ईश्वर द्वारा यह मनुष्य शरीर बनाया गया है और ईश्वर ने कर्म करने के लिए हम को भेजा है लीलाएं धरने के लिए हमें भेजा है जिस जिस प्रकार से सॉफ्टवेयर में यूनिक कंप्यूटर में सॉफ्टवेयर होता है सॉफ्टवेयर डिजाइनर एक होता है और लाखों करोड़ों लोग वर्क उसमें करते हैं सॉफ्टवेयर डिजाइनर जब चाहे लाखों करोड़ों के वर्क पर मिट्टी पलट दे जब वह नष्ट कर दे उसी प्रकार से प्रभु की सत्ता तो भैया मैं यही कहना चाहूंगा भौतिक सुख का आनंद लेते हुए एक नियमानुसार आप सुबह शाम आध्यात्मिक किताबों को पढ़ते हुए आध्यात्मिक गुरुओं की संगत में रहते हुए आध्यात्मिक विचारधारा के साथ योग और ध्यान के माध्यम से भगवत प्राप्ति कर सकते हैं आप अपने जीवन को अपने परिवार के लिए अपने समाज के लिए अपने देश के लिए उपयोगी बना सकते हैं जय मां शीतला

aapka prashna kya adhik aadhyatmik hone ke liye bhautik chijon ko tyagna aavashyak hai yadi haan toh kyon dekhiye main aapko yah bata dena chahta hoon main khud ek mandir ka purohit hoon aur ek prishth ka adhyaksh bhi hoon maine jo apne jeevan me anubhav kiya hai aadhyatmik chijon ko lekar ki bhautikata aur aadhyatmikta ek sikke ke do pahaloo hain agar hum bhautikata ko chodte hain toh ishwar dwara banaye gaye is sharir par hum dost marte hain anil na karte hain paramatma ke niyamon ki agar hum keval aadhyatmik hi raste par badhte hain tu bhi avhelna hoti hai agar ek sikka Rs lijiye ek sher hota hai bakri hoti hai agar aap usko ek taraf bhej dijiye toh koi bhi dukaanadaaron se lega nahi bolega bhaiya yah mithai jhatake me kabhi le le toh baat ki baat hai magar vaah jaankari hai toh nahi lega toh ishwar dwara yah manushya sharir banaya gaya hai aur ishwar ne karm karne ke liye hum ko bheja hai lilaen dharne ke liye hamein bheja hai jis jis prakar se software me Unique computer me software hota hai software designer ek hota hai aur laakhon karodo log work usme karte hain software designer jab chahen laakhon karodo ke work par mitti palat de jab vaah nasht kar de usi prakar se prabhu ki satta toh bhaiya main yahi kehna chahunga bhautik sukh ka anand lete hue ek niyamanusar aap subah shaam aadhyatmik kitabon ko padhte hue aadhyatmik guruon ki sangat me rehte hue aadhyatmik vichardhara ke saath yog aur dhyan ke madhyam se bhagwat prapti kar sakte hain aap apne jeevan ko apne parivar ke liye apne samaj ke liye apne desh ke liye upyogi bana sakte hain jai maa shitalaa

आपका प्रश्न क्या अधिक आध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों को त्यागना आवश्यक है यदि हां तो क

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BK Kalyani

Teacher On Rajyoga Spiritual Knowledge

1:01
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बात अच्छी क्वेश्चन है क्या अधिक आध्यात्मिक होने के लिए कुछ चीजों की आवश्यक है यदि है तो आप जब भक्ति में पूजा करते हो कभी क्यों नहीं अपने मन में सोचते हो कि मैं पूजा कर रहा हूं भगवान की तो बिना खाए क्यों कर रहा हूं खाना खा लेना चाहिए ना खाकर खाना चाहिए भोजन क्यों करते हो भगवान को प्रसन्न करने के लिए अपने आत्मा को दुखी करते हो प्यार से रखते हो बुके रखते हो तब जाकर उसके उपाय करते हैं क्यों क्योंकि आपको जिस चीज की जरूरत है उस चीज को प्राप्त करने के लिए परमात्मा की आप उपवास करते हो ना तब आपको प्राप्ति होती है किसी चीज को पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है तो ठीक इसी तरह धारण करने के लिए नियम अनुसार इसमें कुछ कुछ क्या करना जरूरी है बिना त्याग की प्राप्ति नहीं है

baat achi question hai kya adhik aadhyatmik hone ke liye kuch chijon ki aavashyak hai yadi hai toh aap jab bhakti me puja karte ho kabhi kyon nahi apne man me sochte ho ki main puja kar raha hoon bhagwan ki toh bina khaye kyon kar raha hoon khana kha lena chahiye na khakar khana chahiye bhojan kyon karte ho bhagwan ko prasann karne ke liye apne aatma ko dukhi karte ho pyar se rakhte ho Buke rakhte ho tab jaakar uske upay karte hain kyon kyonki aapko jis cheez ki zarurat hai us cheez ko prapt karne ke liye paramatma ki aap upvaas karte ho na tab aapko prapti hoti hai kisi cheez ko paane ke liye kuch khona padta hai toh theek isi tarah dharan karne ke liye niyam anusaar isme kuch kuch kya karna zaroori hai bina tyag ki prapti nahi hai

बात अच्छी क्वेश्चन है क्या अधिक आध्यात्मिक होने के लिए कुछ चीजों की आवश्यक है यदि है तो आप

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Aanurag Singh

yog & meditation facilitator

0:51
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अधिक आध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों का त्याग ना जरूरी नहीं है यह सब क्या है आपका कॉन्स्टिट्यूशन कहता है आपके पुराने जन्म के कर्म के कुछ लोगों को अपने जीवन में ही खुश विवेकानंद ने छोड़ दिया अधिकतर लोग आज के समय में यदि जीवन के साथ आध्यात्मिक चेतना का विकास करें तो सबसे सुगम और सबसे सरल और सबसे सरल

adhik aadhyatmik hone ke liye bhautik chijon ka tyag na zaroori nahi hai yah sab kya hai aapka Constitution kahata hai aapke purane janam ke karm ke kuch logo ko apne jeevan me hi khush vivekananda ne chhod diya adhiktar log aaj ke samay me yadi jeevan ke saath aadhyatmik chetna ka vikas kare toh sabse sugam aur sabse saral aur sabse saral

अधिक आध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों का त्याग ना जरूरी नहीं है यह सब क्या है आपका कॉन्स

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Dr. Mahesh Mohan Jha

Asst. Professor,Astrologer,Author

1:03
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आपका प्रश्न आध्यात्मिकता के लिए भौतिक चीजों को त्यागना आवश्यक जब तक आप इस भूलोक में है आपको भौतिक चीजों की आवश्यकता होगी चिंटू आवश्यकता के अनुसार हैं भौतिक चीजों का आवश्यक प्रयोग करें आवश्यकता को विलासिता नहीं बनाए जो आवश्यक है जिससे आपका जीव को फालतू हो सकता है उतना तक ही उन चीजों का प्रयोग करें बाकी आप आध्यात्मिक विकास करें धीरे-धीरे स्वता है कि भौतिक वस्तुएं लांच हो जाएगी

aapka prashna aadhyatmikta ke liye bhautik chijon ko tyagna aavashyak jab tak aap is bhulok me hai aapko bhautik chijon ki avashyakta hogi chintu avashyakta ke anusaar hain bhautik chijon ka aavashyak prayog kare avashyakta ko vilasita nahi banaye jo aavashyak hai jisse aapka jeev ko faltu ho sakta hai utana tak hi un chijon ka prayog kare baki aap aadhyatmik vikas kare dhire dhire swata hai ki bhautik vastuyen launch ho jayegi

आपका प्रश्न आध्यात्मिकता के लिए भौतिक चीजों को त्यागना आवश्यक जब तक आप इस भूलोक में है आप

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Dr. M.R.Virani (Alwi)

Doctor (Naturopath), Spiritual Teacher

6:02
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Dr.Nisha Joshi

Psychologist

0:27
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आध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों का त्यागना आवश्यक है यदि हां तो क्यों देखी सबकी अपनी मर्जी होती है अगर कोई इतना चाहता है तो देखना नहीं चाहता है तो मत आगे ठीक है लेकिन अध्यक्ष चीज ऐसी है वह रास्ता ऐसा है कि अगर आपको प्यार नहीं करना होगा तो भी अब बहुत ही अच्छी जगह ऑटोमेटिक ही कर देंगे ठीक है अपने शुभ हो धन्यवाद

aadhyatmik hone ke liye bhautik chijon ka tyagna aavashyak hai yadi haan toh kyon dekhi sabki apni marji hoti hai agar koi itna chahta hai toh dekhna nahi chahta hai toh mat aage theek hai lekin adhyaksh cheez aisi hai vaah rasta aisa hai ki agar aapko pyar nahi karna hoga toh bhi ab bahut hi achi jagah Automatic hi kar denge theek hai apne shubha ho dhanyavad

आध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों का त्यागना आवश्यक है यदि हां तो क्यों देखी सबकी अपनी मर

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International Yogi

spiritual Guru (Life Coach)

0:30
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इसके 2 आंसर है हां बोलना अगर भौतिक चीजें आपके आध्यात्मिक आध्यात्मिक मार्ग में रुकावट बनती हैं तो आप को त्यागना आवश्यक है और अगर आपको लगता है कि भौतिक चीजें आपके मार्ग में रुकावट पैदा नहीं कर रही है तथा मैं आध्यात्मिक मार्ग में आगे बढ़ रहा हूं आसानी से तो आपको किसी भी भौतिक चीज की त्याग की आवश्यकता नहीं है

iske 2 answer hai haan bolna agar bhautik cheezen aapke aadhyatmik aadhyatmik marg mein rukavat banti hain toh aap ko tyagna aavashyak hai aur agar aapko lagta hai ki bhautik cheezen aapke marg mein rukavat paida nahi kar rahi hai tatha main aadhyatmik marg mein aage badh raha hoon aasani se toh aapko kisi bhi bhautik cheez ki tyag ki avashyakta nahi hai

इसके 2 आंसर है हां बोलना अगर भौतिक चीजें आपके आध्यात्मिक आध्यात्मिक मार्ग में रुकावट बनती

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महेश दुबे

कवि साहित्यकार

0:57

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भगवान बुध जब कैवल्य ज्ञान प्राप्त करने के काफी वर्षों बाद वापस अपने राज्य में आए तो उनकी पत्नी यशोधरा ने उनसे पूछा कि वह एक सवाल कि जो सिद्धि आपने जंगल में इतना तब करके प्राप्त कि क्या वह यहां राजमहल में रहते हुए मेरे साथ प्राप्त नहीं की जा सकती थी भगवान बुध निरुत्तर हो गए अरुण यह स्वीकार करना पड़ा कि वह गृहस्थ आश्रम में रहते हुए भी वह सिद्धियां पा सकते थे इसका अर्थ यह है कि यह जरूरी नहीं है कि आपको भौतिक चीजों को त्यागना आवश्यक हो जाए अगर आपको अधिक आध्यात्मिक होना है तो आप घर आश्रम में रहते हुए भी आध्यात्मिक बने रह सकते हैं और जंगल में जाकर के भी भौतिकवादी बनए रखे खान परिवर्तन का कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता आपके मन स्थिति के परिवर्तन का फर्क पड़ता है

bhagwan buddha jab kaivalya gyaan prapt karne ke kaafi varshon baad wapas apne rajya mein aaye toh unki patni yashodhara ne unse poocha ki vaah ek sawaal ki jo siddhi aapne jungle mein itna tab karke prapt ki kya vaah yahan rajmahal mein rehte hue mere saath prapt nahi ki ja sakti thi bhagwan buddha niruttar ho gaye arun yah sweekar karna pada ki vaah grihasth ashram mein rehte hue bhi vaah siddhiyan paa sakte the iska arth yah hai ki yah zaroori nahi hai ki aapko bhautik chijon ko tyagna aavashyak ho jaaye agar aapko adhik aadhyatmik hona hai toh aap ghar ashram mein rehte hue bhi aadhyatmik bane reh sakte hain aur jungle mein jaakar ke bhi bhautikvadi banye rakhe khan parivartan ka koi vishesh fark nahi padta aapke man sthiti ke parivartan ka fark padta hai

भगवान बुध जब कैवल्य ज्ञान प्राप्त करने के काफी वर्षों बाद वापस अपने राज्य में आए तो उनकी प

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J.P. Y👌g i

Psychologist

9:15
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प्रसन्न है क्या अधिक आध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों का त्याग अनावश्यक है दरअसल जो यहां जागने का प्रश्न आ रहा है तो त्याग तो जब तक अपने शरीर का नहीं हो जाता तब तक कोई तैयारी नहीं होता संसार में ही रहता है मनुष्य अध्यात्मिक में संसार के बीच ही अध्ययन करता है लेकिन ऐसा लगता है कि त्यागा जा रहा है त्यागने की आवश्यकता होती है ऐसा सिर्फ यह है कि अपने लक्ष्य के आध्यात्मिक लक्ष्य के अंदर विधान को हटाने की प्रक्रिया रहती है अंत करण में किसका 25 ना पड़े क्योंकि अंत करण अभी कच्चा होता कच्ची भूमि में रहता है और प्ले सही सकारात्मक स्वरूप में तत्काल नहीं किए होता है और उसमें जो जो भर्तियां होती क्योंकि बहुत अहम पहलू होता है आध्यात्मिक को जो गहराई से ले लेते हैं और उसको अपना अंतरण का स्वरूप स्थापित करते हैं तो बोलो उसके अंदर दिखाना पड़ने की वजह से थोड़ा सा इगनोरिंग पॉइंट पर रहते हैं लेकिन ऐसा नहीं होता कि वह त्याग कर देते हैं प्यार नहीं करते हैं बशर्ते यही रहता है कि किसी तरह क्योंकि उस समय उनकी स्थिति इतनी सुंदर सा में रहती और निर्मलता रहती है ज्योति अंतरण के अंदर और उसके द्वार इतने सहज रूप से खुले रहते हैं कि अगर कोई भावनाएं उसके हृदय में आता तंत्र कर्ण की गहराई के पार जाता है और वहां जो विचलित की संभावना होती है तो उसके अंदर बहुत तेज शतक भावनाएं उन्मुख हो जाती हैं तो इसलिए उस लक्ष्य की ऊर्जा को रोकने के लिए यह समाधान है कि थोड़ा सा वातावरण को चेंजिंग करते हैं और अपना अंदर ऐसा साहस बनाते हैं कि जो थोड़ा सा हट करके अपने आपको संग लाइन सकते हैं लेकिन मूड बहुत से यही होता है कि उसके अनुसंधान के अंदर किसी प्रकार की विधान थाना उत्पन्न हो इसलिए ऐसा कर आ जाता क्योंकि हर इंसान कुचिना किचन में संज्ञान होकर एक उपलब्धि को चाहता है अगर वह परिश्रम में कोई विघ्न पड़ता है तो बहुत पता चूत होता है मतलब भ्रष्ट हो जाता है और यह काफी प्रेरणा में क्यों किया जाता है वह उसका कारण मनुष्य में ही रहता है और वह उसके गहराई में चलता जाए चला जाता है और जो भी उसके अंदर करण का बेवरा होता है उसका सेंसर है समाधान है और जो भी इसकी शिक्षण विधियां तलाश करती है और उसमें इस बीच इसकी को सूट इसके साथ सनग्लो रहती है तो उसमें अपने आपको दूसरी दशा में प्रवेश करता है तो इसको हम निर्माण पद भी के बोलते हैं कि अपने आप को नवनिर्मित कर चुका है उस जगह की और ऐसी जगह पहुंच चुका है कि जहां शरीर के लिए अवकाश पर कोई असर नहीं होता है और ऐसा पति ढूंढ चुका है तो भगवान की भक्ति और ईश्वर में ध्यान में ऐसे स्थान औरत से ध्यान की आवश्यकता होती है तब उसका प्रतिफल उसके ध्यान की गहराई में सूक्ष्म आकृतियों का ज्ञान होता चला जाता है भविष्य के बारे में भी इसके उपयोग होने लगता है क्योंकि सामर्थ जब भी आता है जब तक तो ताज के पास किस प्रकार संचालित करते हैं वह और शिष्टमंडल को नहीं रिसर्च ना करने के अंदर उसके अंदर से क्षमता होती है और ऐसी दिव्य चीजें हैं आकाश मंडल में परोक्ष मंडल में जो दिखाई सुनाई समझ में नहीं आता लेकिन वह सहायक हो जाते हैं मनोर बिट्टू के साथ एकाकार लेकिन उसी में ही अपने आप को सुरक्षित रखना तो वहां पर थोड़ा सा इग्नौर रहता है कि मतलब ध्यान महत्वपूर्ण नहीं दे पाता है क्योंकि इसके अंदर मित्रता के ऊपर स्तर ताते दिमाग के की सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण क्या है और उपलब्धि से मुझे सबसे ज्यादा लाभ की चीजों से मिल सकता और अपने जन्म जीवन का भी कारण स्थापित कर लेता कि यही मेरा प्रयोजन है इसलिए एक आदमी सूत्र कि उनकी संभावनाएं हो जाती है तो वह जरूर आता है संसार थे लेकिन वह त्याग देता नहीं है ऐसा प्रतीत होता है क्योंकि इसी संसार में रहकर चाहे वह धरती की पूरी पृष्ठभूमि में कहीं पर भी रहे लेकिन मानसिक दशा से अगर वह विचलित है तो वह कहीं पर भी योग्य नहीं रह पाता अगर उसमें सामर्थ बना हुआ है तो कहीं पर भी वैसे ही मंगलमय समय को उपस्थित करा लेता और आनंदा को स्थापित रखता है यही चीज है कि हमें लगता है त्याग लेकिन आज जो अति पवित्र और क्षमता में रहते हैं तो उसके संरक्षण की विधि में ही आता है किस-किस सुरक्षित कैसा किया जाए तो सुरक्षित करने की वजह से ही अपने मन के लोगों को कंट्रोल में रखता है स्वयं में रखता है क्योंकि वह भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि होती अध्यात्मा कोई साधारण चीज नहीं है कि हम यूं ही सदा न समझ जाते हैं यह भी आत्मिक लक्ष्य होता है और बहुत बड़ी उपलब्धि होती है और समूचा देखा जाता कि संसार में अपने अपने कर्मों को लोग भुगत रहे हैं उसी के कारण सुख दुख का आभास हो रहा है और यह सब दिमाग की उपज होती है क्योंकि मौसम हवाई अपने अमुक रूप से प्रेरित व्यक्ति प्रकृति के अंदर जो निर्लेप दशा में अपने कार्य को कर रही हैं और अशुद्ध में बनी हुई है तो शुद्धता के लिए निर्मलता के लिए अवधारणा होती है और वह अपने अनुरूप से स्वतंत्र होते हैं क्योंकि उसकी प्रकाश का इतनी बढ़ जाती है वह अपनी जो भी हुआ और विकेट सचिन दत्तात्रेय मुकुंद का आवरण होता है उससे वह जो भी डालते अपने आत्मा के इच्छा के ऊपर अनुभव होता वह किसी की परवाह नहीं करते इस चाल ढाल की वजह से भी ऐसा लगता है कि क्या करें लेकिन उनके साथ नेतृत्व क्षमता कितनी होती है कि जाता तो समझ जाते कि मनुष्य की संस्कार स्वरूप का है और से क्या प्राप्त हो सकता है नहीं हो सकता है वह भी जान कारक है तो सब अपने-अपने उस में उलझे उलझे रहते हैं इस प्रकार यह भी रखता क्षेत्र का मंडल है और उसी के लिए अनुशासन और वेशभूषा या और तरह की तफ्तीश जारी है और शैली बना दी गई है और इतना अंतर निर्मल और उस ओर आकर्षित होता है जहां में कि जो समाज की सूझबूझ अवधारणाएं होती है संसार की देश की उससे भी परे हो अपना क्षेत्र मंडल में अपना है ललित दशा में अपने अनुभवी आदमी अन्वेषण करता है मात्र इतना ही रहता है तो ऐसा नहीं होना चाहिए कि भ्रांतियां है जागना है त्यागने की आवश्यकता नहीं है बस यही होता कि डिस्टर्ब ना हो लेकिन जब तक सफलता सफलता अंत करण में नहीं आते परिपूर्णता किसी तत्व नहीं है आती क्योंकि वह एक तोला में धरती की संपदा को तोड़ देता है और संपदा में मैं जब रखता है तो बात उसी का भारी होता है पढ़ना वहीं भारी होता है जो उसका परम तत्व होता है तो उसमें ही दोपहर के अंदर बोलके रखता है अपने विवेक उद्देश्य इस अनुसार का सर क्या है और उसका सर क्या है उसको कहां है तो हमारे पर अवधारणा पर ही बोलता होते कि हम जिसको प्रसेंस करते हैं तो वही हमारे लिए महत्वपूर्ण होता और वही हमारी उपयोगिता बनती है इस कारण वह लोग अलग दिखते हैं लेकिन उनमें सामर्थ और सहनशीलता हुआ हमारे लिए भी आदर्श और सम्मान के प्रत्येक पात्र होते हैं और यह भी संसार की सृष्टि में जगत की सृष्टि में भौतिक की पृष्ठभूमि पर इनका उत्तरण रहता है हमारे को जिस प्रकार हम संसार के अंदर मंदिर मस्जिद इत्यादि पूजा स्थल का जो निरूपण करते हैं वह अपना संभावना क्षेत्र बनारस शमशान हुआ विद्यालय हुआ चिकित्सालय हुआ अदालत परिसर के मंडल में अपना-अपना एक को तो हल होता है इस प्रकार यह भी हमारी धरती की पृष्ठभूमि में शांति स्थापना के महत्त्व में रहने वाली तीर्थ संपदा संपदा बनती है मैं यही कहूंगा धन्यवाद शुभेच्छा

prasann hai kya adhik aadhyatmik hone ke liye bhautik chijon ka tyag anavashyak hai darasal jo yahan jagne ka prashna aa raha hai toh tyag toh jab tak apne sharir ka nahi ho jata tab tak koi taiyari nahi hota sansar mein hi rehta hai manushya adhyatmik mein sansar ke beech hi adhyayan karta hai lekin aisa lagta hai ki tyaga ja raha hai tyaagane ki avashyakta hoti hai aisa sirf yah hai ki apne lakshya ke aadhyatmik lakshya ke andar vidhan ko hatane ki prakriya rehti hai ant karan mein kiska 25 na pade kyonki ant karan abhi kaccha hota kachhi bhoomi mein rehta hai aur play sahi sakaratmak swaroop mein tatkal nahi kiye hota hai aur usme jo jo bhartiyan hoti kyonki bahut aham pahaloo hota hai aadhyatmik ko jo gehrai se le lete hai aur usko apna antran ka swaroop sthapit karte hai toh bolo uske andar dikhana padane ki wajah se thoda sa iganoring point par rehte hai lekin aisa nahi hota ki vaah tyag kar dete hai pyar nahi karte hai basharte yahi rehta hai ki kisi tarah kyonki us samay unki sthiti itni sundar sa mein rehti aur nirmalata rehti hai jyoti antran ke andar aur uske dwar itne sehaz roop se khule rehte hai ki agar koi bhaavnaye uske hriday mein aata tantra karn ki gehrai ke par jata hai aur wahan jo vichalit ki sambhavna hoti hai toh uske andar bahut tez shatak bhaavnaye unmukh ho jaati hai toh isliye us lakshya ki urja ko rokne ke liye yah samadhan hai ki thoda sa vatavaran ko changing karte hai aur apna andar aisa saahas banate hai ki jo thoda sa hut karke apne aapko sang line sakte hai lekin mood bahut se yahi hota hai ki uske anusandhan ke andar kisi prakar ki vidhan thana utpann ho isliye aisa kar aa jata kyonki har insaan kuchina kitchen mein sangyaan hokar ek upalabdhi ko chahta hai agar vaah parishram mein koi vighn padta hai toh bahut pata chut hota hai matlab bhrasht ho jata hai aur yah kaafi prerna mein kyon kiya jata hai vaah uska karan manushya mein hi rehta hai aur vaah uske gehrai mein chalta jaaye chala jata hai aur jo bhi uske andar karan ka bevara hota hai uska censor hai samadhan hai aur jo bhi iski shikshan vidhiyan talash karti hai aur usme is beech iski ko suit iske saath sanaglo rehti hai toh usme apne aapko dusri dasha mein pravesh karta hai toh isko hum nirmaan pad bhi ke bolte hai ki apne aap ko navnirmit kar chuka hai us jagah ki aur aisi jagah pohch chuka hai ki jaha sharir ke liye avkash par koi asar nahi hota hai aur aisa pati dhundh chuka hai toh bhagwan ki bhakti aur ishwar mein dhyan mein aise sthan aurat se dhyan ki avashyakta hoti hai tab uska pratiphal uske dhyan ki gehrai mein sukshm aakrtiyon ka gyaan hota chala jata hai bhavishya ke bare mein bhi iske upyog hone lagta hai kyonki samarth jab bhi aata hai jab tak toh taj ke paas kis prakar sanchalit karte hai vaah aur shishtamandal ko nahi research na karne ke andar uske andar se kshamta hoti hai aur aisi divya cheezen hai akash mandal mein paroksh mandal mein jo dikhai sunayi samajh mein nahi aata lekin vaah sahayak ho jaate hai manor bittu ke saath ekakar lekin usi mein hi apne aap ko surakshit rakhna toh wahan par thoda sa ignore rehta hai ki matlab dhyan mahatvapurna nahi de pata hai kyonki iske andar mitrata ke upar sthar tatte dimag ke ki sabse zyada mahatvapurna kya hai aur upalabdhi se mujhe sabse zyada labh ki chijon se mil sakta aur apne janam jeevan ka bhi karan sthapit kar leta ki yahi mera prayojan hai isliye ek aadmi sutra ki unki sambhavnayen ho jaati hai toh vaah zaroor aata hai sansar the lekin vaah tyag deta nahi hai aisa pratit hota hai kyonki isi sansar mein rahkar chahen vaah dharti ki puri prishthbhumi mein kahin par bhi rahe lekin mansik dasha se agar vaah vichalit hai toh vaah kahin par bhi yogya nahi reh pata agar usme samarth bana hua hai toh kahin par bhi waise hi mangalmay samay ko upasthit kara leta aur ananda ko sthapit rakhta hai yahi cheez hai ki hamein lagta hai tyag lekin aaj jo ati pavitra aur kshamta mein rehte hai toh uske sanrakshan ki vidhi mein hi aata hai kis kis surakshit kaisa kiya jaaye toh surakshit karne ki wajah se hi apne man ke logo ko control mein rakhta hai swayam mein rakhta hai kyonki vaah bhi ek bahut baadi upalabdhi hoti adhyatma koi sadhaaran cheez nahi hai ki hum yun hi sada na samajh jaate hai yah bhi atmik lakshya hota hai aur bahut baadi upalabdhi hoti hai aur samucha dekha jata ki sansar mein apne apne karmon ko log bhugat rahe hai usi ke karan sukh dukh ka aabhas ho raha hai aur yah sab dimag ki upaj hoti hai kyonki mausam hawai apne amuk roop se prerit vyakti prakriti ke andar jo nirlep dasha mein apne karya ko kar rahi hai aur ashuddh mein bani hui hai toh shuddhta ke liye nirmalata ke liye avdharna hoti hai aur vaah apne anurup se swatantra hote hai kyonki uski prakash ka itni badh jaati hai vaah apni jo bhi hua aur wicket sachin Dattatreya mukund ka aavaran hota hai usse vaah jo bhi daalte apne aatma ke iccha ke upar anubhav hota vaah kisi ki parvaah nahi karte is chaal dhal ki wajah se bhi aisa lagta hai ki kya kare lekin unke saath netritva 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प्रसन्न है क्या अधिक आध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों का त्याग अनावश्यक है दरअसल जो यहां

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Ajay Sinh Pawar

Founder & M.D. Of Radiant Group Of Industries

3:19
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क्या अभी आध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों का ज्ञान आवश्यक है यदि हां तो अधिक अध्यापिका करना है तो सबसे पहले तो हमें यह तमन्ना थी क्या-क्या कितना होती क्या है अध्यापिका होती है कि हम अपने आप को हमारी आत्मा के साथ हमारा जो मन है वह आत्मा के करीब है और आत्मा को पहचानने की कोशिश की अध्यक्ष कोई धर्म विशेष या कोई जाति विशेष बात नहीं जो भी आप धर्म के हो आध्यात्मिकता आपके मन में हो तो बहुत ही अच्छी बात है लेकिन यह भौतिक चीजें जो हैं जो हम का उपभोग करते हैं वह उपयोग उपयोग करते हुए एक संसारी के रूप में गृहस्थ के रूप में अगर हम एक काम अगर अपने मामा को एकांत में अगर कुछ समय के लिए अपने आप को दें तो हम आध्यात्मिक हो सकते हैं लेकिन हमें एकांत नहीं मिलता है इसलिए लोग कहते हैं कि भौतिक चीजों को छोड़कर और वन्य चला जाना चाहिए जंगल में जंगल में जाने का मतलब यही है कि इंसान एकांत मेघ आए ताकि वह अपनी आत्मा को पहचान सके आत्मा की आवाज सुन सके अपने आप से बात कर सके और कोई विशेष कारण जो कि यह काम संसार में रहते हुए भौतिक चीजों को भोंकते हुए भी हो सकता है इसलिए यह कहना गलत होगा कि भौतिक चीजों को त्यागना आवश्यक है कोई जरूरी नहीं है आपको अपने आप को कम से कम रोज का अगर एक घंटा भी देते हैं एक घंटा देकर आप एकांत में रहकर योग मेडिटेशन अगर करते हैं और अपने मन से आत्मा को भी गुप्त बातें करेंगे तो आपके आध्यात्मिकता में अति उत्तम आपको विचार मिलेंगे और आप क्या जिंदगी ने भूल कर रहे हैं वर्तमान में घुसकर में अपनी शिक्षा भूले की है और अब जागरूक हो जाएंगे और आप अपना जीवन बेहतर करता है आध्यात्मिकता का मतलब यह नहीं है कि हमको साधु बन जाना है संयासी बन जाना है या जंगल में चले जाता है बहुत तकलीफ में रहकर आध्यात्मिकता को कर पाना यही एक अच्छी बात है और सबको ऐसा जरूर करना चाहिए धन्यवाद आपका सुबह

kya abhi aadhyatmik hone ke liye bhautik chijon ka gyaan aavashyak hai yadi haan toh adhik adhyapika karna hai toh sabse pehle toh hamein yah tamanna thi kya kya kitna hoti kya hai adhyapika hoti hai ki hum apne aap ko hamari aatma ke saath hamara jo man hai vaah aatma ke kareeb hai aur aatma ko pahachanne ki koshish ki adhyaksh koi dharm vishesh ya koi jati vishesh baat nahi jo bhi aap dharm ke ho aadhyatmikta aapke man mein ho toh bahut hi achi baat hai lekin yah bhautik cheezen jo hain jo hum ka upbhog karte hain vaah upyog upyog karte hue ek SANSARI ke roop mein grihasth ke roop mein agar hum ek kaam agar apne mama ko ekant mein agar kuch samay ke liye apne aap ko de toh hum aadhyatmik ho sakte hain lekin hamein ekant nahi milta hai isliye log kehte hain ki bhautik chijon ko chhodkar aur vanya chala jana chahiye jungle mein jungle mein jaane ka matlab yahi hai ki insaan ekant megh aaye taki vaah apni aatma ko pehchaan sake aatma ki awaaz sun sake apne aap se baat kar sake aur koi vishesh karan jo ki yah kaam sansar mein rehte hue bhautik chijon ko bhonkte hue bhi ho sakta hai isliye yah kehna galat hoga ki bhautik chijon ko tyagna aavashyak hai koi zaroori nahi hai aapko apne aap ko kam se kam roj ka agar ek ghanta bhi dete hain ek ghanta dekar aap ekant mein rahkar yog meditation agar karte hain aur apne man se aatma ko bhi gupt batein karenge toh aapke aadhyatmikta mein ati uttam aapko vichar milenge aur aap kya zindagi ne bhool kar rahe hain vartaman mein ghuskar mein apni shiksha bhule ki hai aur ab jagruk ho jaenge aur aap apna jeevan behtar karta hai aadhyatmikta ka matlab yah nahi hai ki hamko sadhu ban jana hai sanyasi ban jana hai ya jungle mein chale jata hai bahut takleef mein rahkar aadhyatmikta ko kar paana yahi ek achi baat hai aur sabko aisa zaroor karna chahiye dhanyavad aapka subah

क्या अभी आध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों का ज्ञान आवश्यक है यदि हां तो अधिक अध्यापिका क

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Anjana Baliga

Counselor

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चेतावनी: इस टेक्स्ट में गलतियाँ हो सकती हैं। सॉफ्टवेर के द्वारा ऑडियो को टेक्स्ट में बदला गया है। ऑडियो सुन्ना चाहिये।

आध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों को त्यागना आवश्यक है यदि हां या ना मेरा मानना है कि जैसे ही भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि संसार भी कई ऐसी वस्तु है जिनसे हमें बहुत सादा आकर्षण होता है और उसे हम मोह लगा बैठते हैं तो जब आपका यह मोह जो है वह हद से ज्यादा बढ़ जाता है तब आप भौतिक चीजों के प्रति आकर्षित हो जाते हैं तो बहुत ही चीजों की इच्छा का मुंह जो है वह त्यागना बहुत जरूरी है अगर आप मांसाहारी हैं और एक दिन आप निश्चय कर लेते हैं कि मैं इसे छोड़ देता हूं और फिर आप कुछ दिन बाद उसको देखने के बाद भी आपकी इच्छा प्रबल रहती है तो उस चीज को छोड़ने का क्या मतलब हुआ जब आप एक डिटेक्टिव लोग मतलब कि उससे मेरा कोई मोहि नहीं है और वह उसका होना और ना होना एक बराबर जब आपके लिए बहुत ही चीज है कोई मायने नहीं रखती हो या ना हो अंदरूनी इच्छा से आप यह जान पाएंगे कि आप उनके प्रति कितने मुंह से बंधे हुए हैं ऐसे मां का अपने बच्चों से बहुत मोहित है वह कभी भी उस लगाओ को नहीं छोड़ती इसी तरह मनुष्य अपने रिश्तेदारों से अपने माता-पिता को पति पत्नी और बच्चों से मुंह लगाता है सब मोह माया के जाल और बंधनों में व्यक्ति को उलझा के रखने के लिए ही भगवान ने ऐसा संसार बनाया इस संसार में रहते हुए भी अगर वह अपना आत्म चिंतन कर लेता है और विकारों से भी परे अपने मन की स्थिति को इस तरह कर लेता है कि वह सच्चितानंद को ढूंढ लेता है तो उसे इन भौतिक के कोई मायने नहीं रखती चाहे वह उसके जीवन में चाय नहीं हूं जो आवश्यक है वह तो हमें करना ही है भोजन ग्रहण करना शरीर के लिए आवश्यक है परंतु हम इससे बहुत ज्यादा लगाओ कर ले तब यह बहुत ही गलत होगा तो मोह माया के बंधन से विपरीत और आत्मा की प्रगति के लिए में नित्य योग और चिंतन करना चाहिए इसी तरह हमारी आध्यात्मिक उन्नति होगी अब जैसे-जैसे हम उन्नति करेंगे तो हमारी भौतिक चीजों की प्रति जो आ सकती है वह दूर होती चली जाएगी इसलिए आध्यात्मिक होने के लिए कुछ त्याग करने की जरूरत नहीं है और यह जो भी सहज रूप से होने लगे तो सोच लीजिए कि आपके अंदर वाक्य में अध्यात्म उन्नति हो रही है और अगर आप जबरदस्ती करने की कोशिश करेंगे तो मन आपका उसी तरह उसी और केंद्रित होगा जैसे कि जब शरीर में दर्द होता है दर्द के बारे में सोचेंगे तो दर्द अधिक पीड़ा देगा परंतु जब आप उसके बारे में सोचेंगे ही नहीं तो अपने आप ही शांत होता चला जाएगा इसलिए मन को शांत करना उसकी गति को शांत करना खुद को समझना और अपने विचारों को ठीक करते हुए पूर्ण रूप से जैसे महात्मा बुध है कई सारे योगियों ने अलग-अलग बयान दिए हैं इस ज्ञान को समझना और इस ज्ञान के ऊपर प्रति अपना आत्म ज्ञानी होने का ही नाम जीवन है धन्यवाद

aadhyatmik hone ke liye bhautik chijon ko tyagna aavashyak hai yadi haan ya na mera manana hai ki jaise hi bhagwan shri krishna ne kaha ki sansar bhi kai aisi vastu hai jinse hamein bahut saada aakarshan hota hai aur use hum moh laga baithate hain toh jab aapka yah moh jo hai vaah had se zyada badh jata hai tab aap bhautik chijon ke prati aakarshit ho jaate hain toh bahut hi chijon ki iccha ka mooh jo hai vaah tyagna bahut zaroori hai agar aap masahari hain aur ek din aap nishchay kar lete hain ki main ise chod deta hoon aur phir aap kuch din baad usko dekhne ke baad bhi aapki iccha prabal rehti hai toh us cheez ko chodne ka kya matlab hua jab aap ek detective log matlab ki usse mera koi mohi nahi hai aur vaah uska hona aur na hona ek barabar jab aapke liye bahut hi cheez hai koi maayne nahi rakhti ho ya na ho andaruni iccha se aap yah jaan payenge ki aap unke prati kitne mooh se bandhe hue hain aise maa ka apne baccho se bahut mohit hai vaah kabhi bhi us lagao ko nahi chhodatee isi tarah manushya apne rishtedaron se apne mata pita ko pati patni aur baccho se mooh lagaata hai sab moh maya ke jaal aur bandhanon mein vyakti ko uljha ke rakhne ke liye hi bhagwan ne aisa sansar banaya is sansar mein rehte hue bhi agar vaah apna aatm chintan kar leta hai aur vikaron se bhi pare apne man ki sthiti ko is tarah kar leta hai ki vaah sachchitanand ko dhundh leta hai toh use in bhautik ke koi maayne nahi rakhti chahen vaah uske jeevan mein chai nahi hoon jo aavashyak hai vaah toh hamein karna hi hai bhojan grahan karna sharir ke liye aavashyak hai parantu hum isse bahut zyada lagao kar le tab yah bahut hi galat hoga toh moh maya ke bandhan se viprit aur aatma ki pragati ke liye mein nitya yog aur chintan karna chahiye isi tarah hamari aadhyatmik unnati hogi ab jaise jaise hum unnati karenge toh hamari bhautik chijon ki prati jo aa sakti hai vaah dur hoti chali jayegi isliye aadhyatmik hone ke liye kuch tyag karne ki zarurat nahi hai aur yah jo bhi sehaz roop se hone lage toh soch lijiye ki aapke andar vakya mein adhyaatm unnati ho rahi hai aur agar aap jabardasti karne ki koshish karenge toh man aapka usi tarah usi aur kendrit hoga jaise ki jab sharir mein dard hota hai dard ke bare mein sochenge toh dard adhik peeda dega parantu jab aap uske bare mein sochenge hi nahi toh apne aap hi shaant hota chala jaega isliye man ko shaant karna uski gati ko shaant karna khud ko samajhna aur apne vicharon ko theek karte hue purn roop se jaise mahatma buddha hai kai saare yogiyon ne alag alag bayan diye hain is gyaan ko samajhna aur is gyaan ke upar prati apna aatm gyani hone ka hi naam jeevan hai dhanyavad

आध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों को त्यागना आवश्यक है यदि हां या ना मेरा मानना है कि जैस

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Liyakat Ali Gazi

Motivational Speaker, Life Coach & Soft Skills Trainer 📲 9956269300

1:10
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जी हां यह तो यदि आप पूरी तरीके से आध्यात्मिक होना चाहते हैं तो भौतिक चीजों को आप को त्याग करना ही पड़ेगा क्योंकि आज हाथ में जो है वह भौतिकता वादी सोच को नहीं मानता है और वहां पर देखिए भौतिकता वादी की जितनी भी है दुनिया में यह सब मन को विचलित करने वाली चीजें हैं दूसरी चीज इस आरामदायक चीजें हैं और जैसे ही किसी इंसान का आरामदायक चीजें मिलती है उसका मन जो है विचलित हो जाता है जब मन विचलित हो जाता है तो जाहिर सी बात है कि आपकी सोच में परिवर्तन आ जाता है आपके अंदर लालच बैठ जाएगा और आध्यात्मिक इन सब चीजों के नहीं मानता स्वीकृत नहीं देता आध्यात्म के लिए आपका मन शांत होना चाहिए और आपको जो है आराम था चीजें ना मिलकर के कष्ट दाग चीजें मिलने के लिए भी तभी जब कुछ कष्ट था से मिलती है तभी आप उसको संजोकर रख सकते हैं

ji haan yah toh yadi aap puri tarike se aadhyatmik hona chahte hain toh bhautik chijon ko aap ko tyag karna hi padega kyonki aaj hath mein jo hai vaah bhautikata wadi soch ko nahi manata hai aur wahan par dekhiye bhautikata wadi ki jitni bhi hai duniya mein yah sab man ko vichalit karne wali cheezen hain dusri cheez is aaramadayak cheezen hain aur jaise hi kisi insaan ka aaramadayak cheezen milti hai uska man jo hai vichalit ho jata hai jab man vichalit ho jata hai toh jaahir si baat hai ki aapki soch mein parivartan aa jata hai aapke andar lalach baith jaega aur aadhyatmik in sab chijon ke nahi manata sawikrit nahi deta aadhyatm ke liye aapka man shaant hona chahiye aur aapko jo hai aaram tha cheezen na milkar ke kasht daag cheezen milne ke liye bhi tabhi jab kuch kasht tha se milti hai tabhi aap usko sanjokar rakh sakte hain

जी हां यह तो यदि आप पूरी तरीके से आध्यात्मिक होना चाहते हैं तो भौतिक चीजों को आप को त्याग

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Ghanshyamvan

मंदिर सेवा

1:15
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अधिक आध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों को चाहने की कोई आवश्यकता नहीं है भौतिक चीजों के प्रति मोह को त्याग नीचे चीजों का प्रयोग कीजिए मानकर का मान कर दीजिए क्योंकि जितने भी भौतिक पदार्थ हैं करके बनाए हैं यदि आप उन्हें अपना मान कर करते हैं तो आपका उनके प्रति मोह होगा तो आपकी आध्यात्मिकता में रुकावट पैदा करेगी इसलिए आप बहुत ही चीजों का उपयोग कीजिए पर उन्हें अपनाने मानिए उन्हें ईश्वर का प्रशासन का ईश्वर की का कर्तव्य समझकर उनके साथ जीवन निर्वाह कीजिए और सरकार प्रति ध्यान अपने आप को समर्पित करते रहिए अपना तो यह शरीर भी नहीं है फिर भौतिक पदार्थों के प्रति मोह करना कहां तक उचित है हरि ओम तत्सत मेरी शुभकामनाएं आपके साथ

adhik aadhyatmik hone ke liye bhautik chijon ko chahne ki koi avashyakta nahi hai bhautik chijon ke prati moh ko tyag niche chijon ka prayog kijiye maankar ka maan kar dijiye kyonki jitne bhi bhautik padarth hain karke banaye hain yadi aap unhe apna maan kar karte hain toh aapka unke prati moh hoga toh aapki aadhyatmikta mein rukavat paida karegi isliye aap bahut hi chijon ka upyog kijiye par unhe apnane maniye unhe ishwar ka prashasan ka ishwar ki ka kartavya samajhkar unke saath jeevan nirvah kijiye aur sarkar prati dhyan apne aap ko samarpit karte rahiye apna toh yah sharir bhi nahi hai phir bhautik padarthon ke prati moh karna kahaan tak uchit hai hari om tatsat meri subhkamnaayain aapke saath

अधिक आध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों को चाहने की कोई आवश्यकता नहीं है भौतिक चीजों के प्

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हमें जिस व्यक्ति खुशी मिले इतिहास के पन्नों को पिलाना चाहिए और अनुप्रयोगों से रिलेशन के उपायों को कार्यो क्रियान्वित करने के पश्चात एवं उसकी प्राप्ति ना होता है भगवान की शरण में जाना चाहिए और इस पर याराना उपासना चिंतन मनन भक्ति और कभी पूजा बीपी और आराधना उपासना चंद्रमा की सहायता में ईश्वर को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए थैंक यू धन्यवाद

hamein jis vyakti khushi mile itihas ke pannon ko pilaana chahiye aur anuprayogon se relation ke upayo ko karyon kriyanwit karne ke pashchat evam uski prapti na hota hai bhagwan ki sharan me jana chahiye aur is par yarana upasana chintan manan bhakti aur kabhi puja BP aur aradhana upasana chandrama ki sahayta me ishwar ko prapt karne ka prayas karna chahiye thank you dhanyavad

हमें जिस व्यक्ति खुशी मिले इतिहास के पन्नों को पिलाना चाहिए और अनुप्रयोगों से रिलेशन के उप

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नमस्कार जी आपको किसने क्या अधिक आध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों को त्यागने आवश्यक इतिहास का साधारण का उत्तर है अगर आपको पढ़ाई करनी है और अच्छे नंबर लाने कौन सी फोन चलाना ही बंद करना पड़ा टीवी देखना है चित्र में जाना जाता है जैसा बनेगा तो काफी अच्छा है उससे आपको अच्छा बेनिफिट होगा उससे आपको काफी अच्छा एल्बम है और कौन सी टेंशन करने के लिए जो चीजें आवश्यक है संयमित जीवन जीना जरूरी है जो की प्राप्ति की जा सकती है धन्यवाद

namaskar ji aapko kisne kya adhik aadhyatmik hone ke liye bhautik chijon ko tyaagane aavashyak itihas ka sadhaaran ka uttar hai agar aapko padhai karni hai aur acche number lane kaun si phone chalana hi band karna pada TV dekhna hai chitra me jana jata hai jaisa banega toh kaafi accha hai usse aapko accha benefit hoga usse aapko kaafi accha album hai aur kaun si tension karne ke liye jo cheezen aavashyak hai sanyamit jeevan jeena zaroori hai jo ki prapti ki ja sakti hai dhanyavad

नमस्कार जी आपको किसने क्या अधिक आध्यात्मिक होने के लिए भौतिक चीजों को त्यागने आवश्यक इतिहा

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Mahesh Kumar

M.no 8360366118.Business Owner,spiritual.social Worker.

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जोकर सवाल हो तो मैं तो भाई जान के मुताबिक आंसर दे सकता हूं बाइबल ऐसा नहीं कहती है कि आपको दिया पिक बनने के लिए संसार को देखना पड़ेगा आप तो परमेश्वर के साथ उसका छोड़िए परमेश्वर के वचनों के ऊपर चलिए और उसके पता करके बता दो उसके मुताबिक जीवन जीना शुरू करें और जरूरी नहीं है कि इस वक्त आपको संसार की चीजों को छोड़ना पड़ेगा उसके साथ भी चल सकते हैं उस परमेश्वर के वचन को परमेश्वर से प्रेम करें लोगों को प्रेम करें अभिषेक यादव के ऊपर चले पैदल में लिखा है रमेश ने कहा है कि जो मुझ से प्रेम करता हूं मेरी अंखियों को मानता है तुमने वादा किया कि मैं तुम्हें अपनी शांति दिए चाहता हूं ऐसी बहुत सारी बातें हैं जो बाइबिल पढ़ेंगे लिखेंगे उसके मुताबिक जीवन जिएंगे तो आपको समझ में आ जाएगा कि मैं यही दुआ बाइबल स्टडी करें पढ़ना शुरू करें धोनी के मैं पुराना नियम नया नियम आप स्टडी करें तो आपको बहुत अच्छी नॉलेज मिल जाएगी

joker sawaal ho toh main toh bhai jaan ke mutabik answer de sakta hoon bible aisa nahi kehti hai ki aapko diya pic banne ke liye sansar ko dekhna padega aap toh parmeshwar ke saath uska chodiye parmeshwar ke vachano ke upar chaliye aur uske pata karke bata do uske mutabik jeevan jeena shuru kare aur zaroori nahi hai ki is waqt aapko sansar ki chijon ko chhodna padega uske saath bhi chal sakte hain us parmeshwar ke vachan ko parmeshwar se prem kare logo ko prem kare abhishek yadav ke upar chale paidal me likha hai ramesh ne kaha hai ki jo mujhse se prem karta hoon meri ankhiyon ko maanta hai tumne vada kiya ki main tumhe apni shanti diye chahta hoon aisi bahut saari batein hain jo bible padhenge likhenge uske mutabik jeevan jeeenge toh aapko samajh me aa jaega ki main yahi dua bible study kare padhna shuru kare dhoni ke main purana niyam naya niyam aap study kare toh aapko bahut achi knowledge mil jayegi

जोकर सवाल हो तो मैं तो भाई जान के मुताबिक आंसर दे सकता हूं बाइबल ऐसा नहीं कहती है कि आपको

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नहीं एक आध्यात्मिक को पाने के लिए छुपाने के लिए यह जरूरी नहीं कि उसे भौतिक चीजों को त्याग करना आवश्यक है यदि बहुत सी चीजें आध्यात्मिक ज्ञान के बीच में रुकावटें पैदा होती है तो वह अपने आप ही भौतिक चीजों की कमियां होने लगी है वैसे तो हमें भौतिक चीजों का उतना ही इस्तेमाल करना चाहिए जितना मैं मेरे जीवन को सुचारू रूप से चलाया जा सके ना कि मन की शरारती की वजह से कई व्यक्तियों की मन जो कहता है सिर्फ वही करता है आवश्यक क्रम में कई प्रकार की ऐसी भौतिक वस्तुओं का उपयोग करने लगते हैं जिससे उनका ध्यान आध्यात्मिक से हटकर पूर्ण ध्यान भौतिक पर चला जाता है जिससे आध्यात्मिकता की कमी होती है धन्यवाद

nahi ek aadhyatmik ko paane ke liye chhupaane ke liye yah zaroori nahi ki use bhautik chijon ko tyag karna aavashyak hai yadi bahut si cheezen aadhyatmik gyaan ke beech mein rookaavatein paida hoti hai toh vaah apne aap hi bhautik chijon ki kamiyan hone lagi hai waise toh hamein bhautik chijon ka utana hi istemal karna chahiye jitna main mere jeevan ko sucharu roop se chalaya ja sake na ki man ki shararti ki wajah se kai vyaktiyon ki man jo kahata hai sirf wahi karta hai aavashyak kram mein kai prakar ki aisi bhautik vastuon ka upyog karne lagte hain jisse unka dhyan aadhyatmik se hatakar purn dhyan bhautik par chala jata hai jisse aadhyatmikta ki kami hoti hai dhanyavad

नहीं एक आध्यात्मिक को पाने के लिए छुपाने के लिए यह जरूरी नहीं कि उसे भौतिक चीजों को त्याग

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